Pratityasamutpada of Buddhism : प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है

Pratityasamutpada of Buddhism

Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi : Pratitya-Samutpada – “The Doctrine of Dependent Origination” : विद्यादूत के इस लेख में हम बौद्ध दर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada in hindi) की व्याख्या करेंगें | बौद्ध दर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक विषय का कोई-न-कोई कारण होता है और कोई भी घटना बिना कारण के उपस्थित नही हो सकती है | यह लेख सिविल सेवा परीक्षा (UPSC Examination Notes in Hindi) और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए अतिमहत्वपूर्ण है | इस लेख में, प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है, प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम, प्रतीत्यसमुत्पाद का प्रतिपादन किसने किया, प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ क्या है, प्रतीत्यसमुत्पाद के स्वरुप कितने हैं, Pratiyasamutpada pdf, What is Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi, Pratityasamutpada kya hai, द्वादश निदान चक्र क्या है, Pratityasamutpada in hindi, Pratityasamutpada upsc notes in hindi, Pratityasamutpada definition, Pratityasamutpada notes in hindi, Pratitya samutpada in hindi, What is Pratityasamutpada in Buddhism in Hindi आदि से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर दिया गया है |

भारतीय दर्शन पाश्चात्य दर्शन से मुख्यतः इस रूप से भिन्नता रखता है कि यहाँ के सभी दार्शनिक संसार को दुःखमय मानकर दुःख के कारणों को ज्ञात करने का प्रयास करता है |

महात्मा बुद्ध भी अन्य भारतीय दार्शनिकों की भांति इस परम्परा का पालन करते है | उन्होंने बोधि-प्राप्ति के पश्चात् अपनी अमूल्य शिक्षाओं के सारांश को अपने ‘चार आर्य सत्य’ (Four Noble Truths of Buddhism) के रूप में व्यक्त किया |

गौतम बुद्ध ने अपने चार आर्य-सत्यों (Four Noble Truths of Buddha) के माध्यम से दुःख, दुःख का कारण, दुःखनिरोध और दुःखनिरोध मार्ग पर विस्तार से चर्चा की है |

गौतम बुद्ध के प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada of Buddha in Hindi) को समझने से पहले आपको यह जानना जरूरी है कि “चार आर्य सत्य क्या है ?”

विद्यादूत में इसके पूर्व ही गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य (Char Arya Satya) पर विस्तार से चर्चा की जा चुकी है |

महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं सैद्धांतिक से ज्यादा व्यावहारिक है | उनकी शिक्षाओं का सर्वप्रमुख उद्देश्य मानव को दुःखों से मुक्ति दिलाना था, न कि उन्हें दार्शनिक तत्वों (आत्मा, ईश्वर, जगत्, मरणोत्तर जीवन) के विषयों में उलझाना |

बुद्ध को तत्वशास्त्रविरोधी (anti-metaphysical) भी कहा जाता है, क्योकि वें तत्वशास्त्रीय समस्याओं से तटस्थ (indifferent) रहा करते थें |

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वास्तव में बुद्ध ने सैद्धांतिक चिन्तन पर जोर न देकर व्यावहारिक चिन्तन को ही मूल्यवान माना है | यह कहना गलत न होगा कि गौतम बुद्ध दार्शनिक कम और समाज सुधारक ज्यादा थें |

यही कारण है कि जब भी कभी बुद्ध से कोई दार्शनिक प्रश्न पूछा जाता तो वें मौन हो जाते थें |

अब हम उन प्रश्नों पर चर्चा करते है जिन पर महात्मा बुद्ध मौन हो जाते है |

अव्याकतानि (Indeterminaable Questions) : Pratityasamutpada in Hindi

ऐसे 10 दार्शनिक प्रश्न, जिनके सम्बन्ध में बुद्ध मौन हो जाते थें, इस प्रकार है –

  1. क्या यह संसार शाश्वत (eternal) है ?
  2. अथवा यह संसार अशाश्वत (non-eternal) है ?
  3. अथवा यह संसार ससीम (finite) है ?
  4. अथवा यह संसार असीम (infinite) है ?
  5. क्या आत्मा व शरीर एक है ?
  6. क्या आत्मा व शरीर भिन्न है ?
  7. क्या मृत्यु के पश्चात् तथागत का पुर्नजन्म होता है ?
  8. क्या मृत्यु के पश्चात् तथागत का पुनर्जन्म नही होता है ?
  9. क्या तथागत का पुर्नजन्म होना और न होना दोनों ही सत्य है ?
  10. क्या तथागत का पुर्नजन्म होना और न होना दोनों ही असत्य है ?

ऊपर दिए गये प्रश्न जब गौतम बुद्ध से पूछा जाता तो वें मौन हो जाते थें | इन 10 प्रश्नों को पाली साहित्य में अव्याकतानि या अव्याकृत प्रश्नानि (Indeterminaable Questions) कहा गया है |

इन 10 प्रश्नों (अव्याकृत प्रश्नानि) में से पहले 4 प्रश्न संसार से सम्बन्धित हैं, उसके बाद के 2 प्रश्नों का सम्बन्ध आत्मा से हैं और अंतिम 4 प्रश्न तथागत से सम्बन्धित हैं |

पाठकों को बता दें कि बौद्ध दर्शन में तथागत निर्वाण को अंगीकार करने वाले महापुरुष को कहा जाता है |

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Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi : अब हम प्रतीत्य-समुत्पाद (Pratitya-samutpada) पर चर्चा करते है | गौतम बुद्ध ने अपने दूसरे आर्य सत्य में दुःख के कारण का विश्लेषण एक सिद्धांत के माध्यम से किया है |

इस सिद्धांत को संस्कृत में प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada – The Doctrine of Dependent Origination) का नाम दिया है, जबकि इसे पाली भाषा में पटिच्यसमुत्पाद कहा गया है |

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत को आश्रित उत्पत्ति का सिद्धांत (The doctrine of Dependent Origination) भी कहा जाता है, क्योकि यह कार्य की उत्पत्ति को कारण पर आश्रित मानता है |

प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है : Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi

Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi : महात्मा बुद्ध के द्वितीय आर्य सत्य में प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada) का वर्णन मिलता है | प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत बौद्ध दर्शन का केन्द्रीय सिद्धांत है |

प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत पर ही बौद्ध दर्शन के अन्य दार्शनिक सिद्धांत जैसें, क्षणिकवाद, नैरात्मवाद, संघातवाद आधारित हैं |

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यह कार्यकारण सिद्धांत पर आधारित है | अर्थात् प्रतीत्यसमुत्पाद बौद्ध दर्शन का कारणता का सिद्धांत है | गौतम बुद्ध ने अपने द्वितीय आर्य सत्य में दुःख के कारणों को स्पष्ट किया है | उन्होंने बताया कि दुःख के उत्पन्न होने का कारण भी होता है, क्योकि इस संसार में कोई भी घटना बिना किसी कारण के घटित नही होती |

प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada of Buddhism) को महत्व देते हुए गौतम बुद्ध कहते है कि “जो प्रतीत्यसमुत्पाद को जानता है, वह धर्म को जानता है और जो धर्म को जानता है, वह प्रतीत्यसमुत्पाद को जानता है |”

प्रतीत्यसमुत्पाद शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है – प्रतीत्य और समुत्पाद | यहाँ प्रतीत्य का अर्थ है ‘किसी वस्तु के उपस्थित होने पर’ (depending) और समुत्पाद का अर्थ है ‘किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति’ (origination) |

इस प्रकार प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ हुआ ‘एक वस्तु के उपस्थित होने पर किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति’ अर्थात् एक के आगमन से दूसरे की उत्पत्ति |

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के अनुसार ‘A’ के रहने पर ‘B’ का प्रादुर्भाव होगा और ‘B’ के रहने पर ‘C’ की उत्पत्ति होगी |

प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada of Buddhism) का नियम बतलाता है कि “यदि वह है तो यह है, उसके उदय से इसका उदय होता है |” महात्मा बुद्ध ने इस सिद्धांत के माध्यम से दुःख के कारण को जानने का प्रयास किया है |

इस प्रकार बौद्ध दर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कार्यकरण सिद्धांत पर आधारित है, जो यह सिद्ध करता है कि प्रत्येक कार्य अपने कारण पर आश्रित है |

Pratityasamutpada in hindi : अब हम जानेगें कि प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत को ‘द्वादश-निदान’ (The Twelve Sources), ‘द्वादश-निदान चक्र‘, ‘जन्ममरण चक्र’ (The Cycle of Birth and Death), ‘संसारचक्र’ (The Wheel of The World), ‘भावचक्र’ (The Wheel of Existence) और धर्मचक्र क्यों कहा जाता है |

  • द्वादश-निदान’ (The Twelve Sources) : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत दुःख के कारण को जानने के लिए 12 निदानों (कड़ियों) का वर्णन करता है, इसलिए इस सिद्धांत को द्वादश निदान कहते है |
  • जन्ममरण चक्र’ (The Cycle of Birth and Death) : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत मानव के जीवन-मरण चक्र को निश्चित करता है, इसलिए यह जन्म-मरण चक्र भी कहलाता है |
  • संसारचक्र’ (The Wheel of The World) : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत यह वर्णन करता है कि मानव का विश्व में आवागमन किस प्रकार होता है, इसलिए इसे संसारचक्र भी कहा जाता है |
  • भावचक्र’ (The Wheel of Existence) : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत मानव के अस्तित्व के प्रश्न पर विचार करता है, इसलिए इसे भावचक्र भी कहते है |
  • धर्मचक्र : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत धर्म का स्थान ग्रहण करता है, इसलिए इसे धर्मचक्र भी कहा जाता है |

इस द्वादश निदान में एक अंग (निदान) दूसरे क्रमागत अंग (निदान) का कारण है | कार्यकारण की यह 12 कड़ियों (अंगों) की श्रृंखला स्वयं चलती रहती है |

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द्वादश निदान : प्रतीत्यसमुत्पाद : Pratityasamutpada of Buddhism

Pratityasamutpada in Hindi : महात्मा बुद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत को मध्यम मार्ग (मध्यमा प्रतिपद्) कहते है | क्योकि प्रतीत्यसमुत्पाद शाश्वतवाद (Eternalism) और उच्छेदवाद (Nihilism) के बीच का मार्ग है |

आपको बता दे कि शाश्वतवाद के अनुसार तत्व नित्य अनादि व अविनाशी है और उच्छेदवाद के अनुसार वस्तुओं के नष्ट हो जाने पर कुछ भी नही रहता है |

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत में दुःख का कारण पता लगाने हेतु बारह कड़ियों (निदान) की विवेचना की गयी है, जिसमे से प्रत्येक कड़ी को एक ‘निदान’ कहा गया है | इसमे निदानों की संख्या 12 है, अतः इस सिद्धांत को ‘द्वादश निदान’ कहा गया है | इसमे अविद्या को समस्त दुःखों (जरामरण) का मूल कारण माना गया है |

ये द्वादश निदान : प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada of Buddhism) निम्नलिखित है : Pratityasamutpada in Buddhism in Hindi

  1. अविद्या (Ignorance)
  2. संस्कार (Impressions)
  3. विज्ञान (Consciousness)
  4. नामरूप (Mind-Body Organism)
  5. षडायतन Six Sense Organs
  6. स्पर्श (Sense Contact)
  7. वेदना ( Sense Experience)
  8. तृष्णा (Craving)
  9. उपादान (Mental Clinging)
  10. भव (The Will To Be Born)
  11. जाति (Rebirth)
  12. जरामरण (Suffering)

प्रथम अविद्या और अंतिम जरामरण को छोडकर शेष 10 निदानों को ‘कर्म‘ भी कहा जाता है |

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Pratityasamutpada in Hindi : प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है

अब हम “प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है : Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi” पर विस्तार से चर्चा करते है –

अविद्या (Ignorance)

अविद्या, समस्त दुःखों का मूल कारण है | अविद्या का अर्थ है- ज्ञान का अभाव | अविद्या का नाश केवल विद्या से ही सम्भव है | विद्या द्वारा वस्तुओं के वास्तविक और यथार्थ का ज्ञान होता है |

अवास्तविक वस्तु को वास्तविक मानना, दुःख उत्पन्न करने वाली वस्तु को सुख उत्पन्न करने वाली समझना आदि अविद्या का प्रतीक है | वस्तुओं के वास्तविक व यथार्थ स्वरुप को नही जानने के कारण अविद्या संस्कार को जन्म देती है |

संस्कार (Impressions)

संस्कार (कर्म), संस्कार का अर्थ है – संस्कारों के रूप में संचित कर्म | पूर्वजन्म के कर्मों के प्रभाव के कारण संस्कार का जन्म होता है | संस्कार से विज्ञान उत्पन्न होता है |

विज्ञान (Consciousness)

विज्ञान या चेतना के कारण गर्भावस्था में शिशु के शरीर व मन का विकास होता है | अगर गर्भावस्था में विज्ञान का अभाव हो जाये तो शिशु के शरीर व मन का विकास रूक जायेगा | विज्ञान से नामरूप उत्पन्न होता है |

नामरूप (Mind-Body Organism)

नामरूप,(*नामरूप ‘मन और शरीर’ का समानार्थक है) गर्भस्थ शिशु के ‘मन’ और ‘शरीर’ का समूह है | अर्थात् मन व शरीर के समूह को नामरूप कहा गया है |

मन और शरीर से इन्द्रियों का विकास होता है | शरीर में पाँच बाह्य इन्द्रियाँ होती है और मन को एक आन्तरिक (छठी) इन्द्रिय माना जाता है | नामरूप से षडायतन उत्पन्न होते है |

षडायतन (Six Sense Organs)

षडायतन अर्थात् छह आयतन, मन सहित पाँच बाह्य इन्द्रियों या ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा) का समूह है | ये छह आयतन या इन्द्रियाँ ही विषयों के साथ सम्पर्क ग्रहण करती है | यदि इंद्रिया न हो तो स्पर्श कैसे होता ? षडायतनसे स्पर्श उत्पन्न होता है |

स्पर्श (Sense Contact)

स्पर्श, इंद्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क है | जब इंद्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होता है तब इंद्रियानुभूति (वेदना का उदय) होता है | स्पर्श से वेदना उत्पन्न होती है |

वेदना ( Sense Experience)

वेदना का अर्थ है पूर्व इन्द्रियानुभव अर्थात् पहले का विषय भोग | इंद्रियों के द्वारा मनुष्य को सुख की अनुभूति होती है और यह अनुभूति तृष्णाओं को जीवित रखती है |

वेदना के तीन रूप होते है, सुखरूप, दुःखरूप और उदासीनरूप | वेदना से तृष्णा उत्पन्न होती है |

तृष्णा (Craving)

तृष्णा (इच्छा), इन्द्रिय सुख प्राप्त करने की तीव्र इच्छा है | यह व्यक्ति में रूप, स्पर्श, रंग, रस, गंध, शब्द आदि विषयों का भोग करने की वासना है | तृष्णा से उपादान उत्पन्न होता है |

उपादान (Mental Clinging)

उपादान (अस्तित्व का मोह), विषय-सुख से आसक्त (लिप्त) रहने की चाह है अर्थात् भोगों से बुरी तरह चिपके रहना | उपादान से भव उत्पन्न होता है |

भव (The Will To Be Born)

भव (अस्तित्व), जन्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति है | यह प्रवृत्ति या इच्छा ही मानव को जन्म (और पुनर्जन्म) ग्रहण करने हेतु प्रेरित करती है | भव से जाति उत्पन्न होती है |

जाति (Rebirth)

जाति (पुनर्जन्म) का अर्थ जन्म ग्रहण करना है | इसमे पुनर्जन्म भी शामिल है | जब मनुष्य शरीर धारण करता है तो उसे सांसारिक दुःख का सामना करना पड़ता है |

इसलिए जन्म ग्रहण करना (शरीर धारण करना) मानव का बड़ा दुर्भाग्य है | पुनः जाति से जरामरण उत्पन्न होता है |

जरामरण (Suffering)

जरामरण (दुःख) शब्द ‘जरा’ और ‘मरण’ शब्दों के मिलने से बना है | जरा का अर्थ ‘वृद्धावस्था’ और मरण का अर्थ ‘मृत्यु’ होता है | यद्यपि जरामरण का शाब्दिक अर्थ वृद्धावस्था और मृत्यु है, लेकिन यहाँ जरामरण शब्द दुःखों के प्रतीक (संकेत) के रूप में प्रयुक्त हुआ है |

महात्मा बुद्ध ने संसार के सभी दुःखों को सांकेतिक रूप से जरामरण कहा है |

Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi : ये सभी बारह कड़ियाँ (निदान) एक दूसरे से जुडकर चक्र की भांति घूमती रहती है | मृत्यु के बाद भी ये चक्र रुकता नही है, क्योकि अविद्या और संस्कार इस चक्र को चलाते रहते है और पुनः नये जन्म से शुरू हो जाता है | इसीलिए इसे जन्ममरणचक्र भी कहते है |

इस चक्र का मूल कारण अविद्या है और जब तक अविद्या का अंत नही होता यह चक्र चलता रहता है और मानव इसमे फँसकर दुःख भोगता रहता है |

अविद्या के अंत होते ही इस चक्र की कड़ियाँ एक के बाद एक अपने आप टूट जाती है |

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Pratityasamutpada of Buddhism in Hindi : Pratityasamutpada in Buddhism in Hindi

प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada) की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसकी 12 कड़ियाँ मानव की भूत, वर्तमान व भविष्य के जीवनों में व्याप्त है |

इन बारह कड़ियों में प्रथम दो (अविद्या व संस्कार) का सम्बन्ध अतीत जीवन (पूर्वजन्म) से है, अंतिम दो (जाति व जरामरण) का सम्बन्ध भविष्य जीवन से है और शेष (विज्ञान से भव तक) का सम्बन्ध वर्तमान जीवन से है |

वर्तमान जीवन का कारण अतीत जीवन है और वर्तमान जीवन का कार्य भविष्य जीवन है |

जिनका सम्बन्ध अतीत जीवन से है
1. अविद्या (Ignorance)
2. संस्कार (Impressions)
जिनका सम्बन्ध वर्तमान जीवन से है
3. विज्ञान (Consciousness)
4. नामरूप (Mind-Body Organism)
5. षडायतन (Six Sense Organs)
6. स्पर्श (Sense Contact)
7. वेदना ( Sense Experience)
8. तृष्णा (Craving)
9. उपादान (Mental Clinging)
10. भव (The Will To Be Born)
जिनका सम्बन्ध भविष्य जीवन से है
11. जाति (Rebirth)
12. जरामरण (Suffering)

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत (Pratityasamutpada of Buddhism) को गौतम बुद्ध की मौलिक देन माना जाता है | प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada) का परवर्ती बौद्धमत में भी प्रमुख स्थान बना रहा |

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के आधार पर हीनयानियों ने क्षणभंगवाद और माध्यमिकों ने शून्यवाद की स्थापना की |

हीनयानियों ने प्रतीत्यसमुत्पाद को वास्तविक कारण-कार्यवाद माना है | शून्यवाद में प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ भिन्न है | यह कारणकार्यवाद को आभासमात्र मानता है | इसमे पदार्थों की वास्तविक उत्पत्ति नही बल्कि मात्र प्रतीत होती है | विज्ञानवाद में प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ गति है, एक ऐसा संसार जो अनिवार्य रूप में गतिशील है |

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