UGC NET Paper 1 Notes PDF Free Download in Hindi

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NTA UGC NET Paper 1 Notes PDF Free Download in Hindi : विद्यादूत (vidyadoot) में आज हम NTA UGC NET Paper 1st Study Material Notes टॉपिक पर चर्चा करेंगें | “UGC NET/NTA NET Paper 1 PDF in Hindi” पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण व पॉपुलर पोस्ट – “हिंदी में यूजीसी नेट पेपर 1 अध्ययन सामग्री पीडीएफ” विद्यादूत में पहले ही प्रकाशित की जा चुकी है, जिसमे विद्यादूत के एक्सपर्ट्स ने ‘यूजीसी नेट के पेपर फर्स्ट की तैयारी कैसे करें‘ की भी बखूबी जानकारी दी है | नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (National Eligibility Test) अर्थात् राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा भारत में एक राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा है | एनटीए यूजीसी नेट परीक्षा (NTA UGC-NET Exams) यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की ओर से भारत के विश्वविद्यालय व डिग्री कॉलेजों के लिए सहायक प्रोफेसर (Assistant Professor) और जूनियर रिसर्च फैलोशिप (Junior Research Fellowship) अथवा दोनों की पात्रता निर्धारित (determining the eligibility) करने के लिए एक वर्ष (जून, दिसम्बर) में दो बार आयोजित की जाती है | इस लेख में यूजीसी नेट फर्स्ट पेपर (नेट पेपर 1 स्टडी मटेरियल इन हिंदी) पर विशिष्ट अध्ययन सामग्री प्रस्तुत की गयी है |

NTA UGC NET PAPER 1 PDF IN HINDI : यूजीसी नेट परीक्षा में परीक्षार्थियों के द्वारा प्राप्त नम्बरों से मेरिट तैयार की जाती है, इनमे उच्च नम्बर पाने वाले कुछ परीक्षार्थीयों को जूनियर रिसर्च फैलोशिप (जेआरएफ) और शेष को नेट (असिस्टैंट प्रोफेसर) के लिए चुना जाता है | जूनियर रिसर्च फैलोशिप (जेआरएफ) के लिए चयनित परीक्षार्थियों को अनुसन्धान (रिसर्च) के लिए स्कॉलरशिप प्रदान की जाती है | नेट उत्तीर्ण परीक्षार्थी को स्कॉलरशिप नही प्रदान की जाती है |

NTA UGC Net Paper 1 Study Material PDF in Hindi : वर्तमान में यूजीसी नेट परीक्षा का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) [National Testing Agency – NTA] द्वारा किया जा रहा है | जून, 2018 तक यूजीसी नेट परीक्षा का आयोजन भारत के 91 शहरों में 84 विषयों में सीबीएसई (CBSE) द्वारा किया गया था | इसके पश्चात् दिसम्बर 2018 से यूजीसी-नेट परीक्षा का आयोजन टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) द्वारा किया जा रहा है |

विद्यादूत में यूजीसी नेट (यूजीसी नेट पेपर फर्स्ट नोट्स इन हिन्दी पीडीएफ) से सम्बन्धित निम्नलिखित 3 लेख पहले ही पोस्ट किये जा चुके है, आप इन्हे भी जरुर पढ़ें –

  1. UGC NET PAPER first Study Material PDF in Hindi
  2. UGC NET Previous Years Paper
  3. यूजीसी नेट की तैयारी कैसे करें ?

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UGC NET FULL INFORMATION 2021 (INFORMATION BULLETIN)DOWNLOAD PDF FREE

एनटीए यूजीसी नेट पेपर 1 सिलेबस (NTA UGC NET PAPER FIRST SYLLABUS) को 10 यूनिट में विभाजित किया गया है | प्रत्येक यूनिट से 5 प्रश्न दिए जायेगें और प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का होगा | एनटीए यूजीसी नेट पेपर 1 सिलेबस के 10 यूनिट्स इस प्रकार है –

यूनिट 1शिक्षण अभिवृत्तिTeaching Aptitude
यूनिट 2शोध अभिवृत्तिResearch Aptitude
यूनिट 3बोधComprehension
यूनिट 4सम्प्रेषणCommunication
यूनिट 5गणितीय तर्क और अभिवृत्तिMathematical Reasoning and Aptitude
यूनिट 6युक्तियुक्त तर्कLogical Reasoning
यूनिट 7आंकड़ों की व्याख्याData Interpretation
यूनिट 8सूचना एवं संचार प्रोद्योगिकी (आई.सी.टी.)Information and Communication Technology
यूनिट 9लोग, विकास और पर्यावरणPeople, Development and Environment
यूनिट 10उच्च शिक्षा प्रणालीHigher Education System

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शिक्षण अभिवृत्ति (Teaching Aptitude)

NTA UGC NET Paper 1 Teaching Aptitude (शिक्षण अभिवृत्ति यूजीसी नेट पीडीएफ) की अध्ययन सामग्री (यूजीसी एनटीए पेपर फर्स्ट स्टडी मटेरियल) बहुत अधिक विस्तृत है | इसलिए विद्यादूत के एक्सपर्ट ने इसको कई खंडो में बाँट दिया है | शिक्षा और शिक्षण से सम्बन्धित लेखों को विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दी गयी पोस्ट पर क्लिक करें –

शिक्षा का अर्थ और परिभाषाएंCLICK HERE
शिक्षा के प्रकारCLICK HERE
औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा में अंतरCLICK HERE
शिक्षा का संकुचित और व्यापक अर्थCLICK HERE
शिक्षा एक प्रक्रिया के रूप मेंCLICK HERE
शिक्षा के उद्देश्य क्या हैCLICK HERE
शिक्षा के अंग या घटकCLICK HERE
शिक्षा का क्षेत्रCLICK HERE
source : vidyadoot (best education website)

Teaching Aptitude Notes in Hindi PDF Download

शिक्षण अभिवृत्ति यूजीसी एनटीए नेट पीडीएफ (Teaching Aptitude Notes in Hindi PDF Free Download)

ये भी देखें – UPSESSB UP PGT TGT Syllabus Free Download PDF

शिक्षण से सम्बन्धित कुछ अवधारणाएँ (Some Concepts Related to Teaching)

UGC NET Paper 1 PDF in Hindi : शिक्षण अभिवृत्ति (Teaching Aptitude) के अंतर्गत अब हम शिक्षण से सम्बन्धित कुछ अवधारणाओं (Some Concepts Related to Teaching) पर चर्चा करेंगें | शिक्षण अभिवृत्ति यूजीसी नेट पीडीएफ (UGC NTA NET First Paper Notes in Hindi PDF Download)

1. शिक्षण के तीन आधार (Three Pillars of Education)

शिक्षा की प्रक्रिया में तीन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण होता है – क्यों, कैसे और क्या | क्यों (Why) का उत्तर सबसे महत्वपूर्ण है | क्यों का उत्तर दर्शनशास्त्र (Philosophy) के द्वारा दिया जाता है | कैसे (how) का उत्तर मनोविज्ञान (Psychology) के द्वारा दिया जाता है और क्या (What) का उत्तर समाजशास्त्र (Sociology) के द्वारा दिया जाता है | इसप्रकार शिक्षा (Education) का मूल आधार दर्शनशास्त्र (Philosophy), मनोविज्ञान (Psychology), समाजशास्त्र (Sociology) है |

2. आदर्शवाद (Idealism)

आदर्शवाद पाश्चात्य दर्शन (Western philosophy) की प्राचीन विचारधारा है | पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति यूनान (ग्रीस) में हुई | आदर्शवाद की उत्पत्ति विचारवादी सिद्धांत (Theory of ideas) से हुई है | आदर्शवाद को अंग्रेजी भाषा में आइडियलिज्म (Idealism) कहा जाता है, जोकि आईडियाइज्म (Ideaism) से उत्पन्न हुआ है | आईडियाइज्म (Ideaism) शब्द दो शब्दों idea और ism से बना है | बाद में उच्चारण की सुविधा के लिए idea में L (एल) अक्षर जोड़कर इसे Idealism (Ideal+ism) बना दिया गया | आदर्शवाद पाश्चात्य दर्शन (Western Philosophy) की प्राचीन विचारधारा है | पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति यूनान से मानी जाती है |

पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो यूनान के प्रथम दार्शनिक थें, जिन्होंने अपने दार्शनिक विचार को बहुत ही व्यवस्थित व तर्कपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया था |

आदर्शवाद विचारधारा के समर्थक विद्वान् है – थेल्स, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, देकार्ते, लाइबनीज, स्पिनोजा, हीगल, बर्कले, कांट, जेंटाइल, शैलिंग, शोपनहावर आदि |

शिक्षा के क्षेत्र में आदर्शवाद का प्रायोज करने वाले प्रमुख पाश्चात्य दार्शनिक है – जर्मनी के पेस्टालॉजी, फ्रोबेल और हरबर्ट, अमेरिका के हार्न, इंग्लैंड के नन, इटली के जेन्टिले आदि |

भारतीय आदर्शवादी विद्वानों में प्रमुख है – स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी, अरविंदो घोष, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि |

पाश्चात्य जगत में  प्लेटो की विचारधारा को आदर्शवाद की संज्ञा दी गई है | प्लेटो के पश्चात उनके शिष्य अरस्तु ने उनकी विचारधारा को कुछ अपने ढंग से आगे बढ़ाया |

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आदर्शवाद के रूप (Forms of Idealism)

आदर्शवाद के विभिन्न रूप निम्नलिखित है –

  1. नैतिक आदर्शवाद (Moralistic Idealism
  2. आत्मनिष्ट आदर्शवाद (Subjective Idealism)
  3. बुद्धिवादी आदर्शवादी (Intellectual Idealism)
  4. निरपेक्ष आदर्शवाद (Absolute Idealism)
  5. बहुतत्ववादी आदर्शवाद (Pluralistic Idealism)

1. नैतिक आदर्शवाद (Moralistic Idealism)

प्लेटो ने नैतिक आदर्शवाद (Moralistic Idealism) का प्रतिपादन किया था | प्लेटो के दर्शन का केंद्र-बिंदु विचार है | उनके अनुसार विचार ही सम्पूर्ण जगत् का आधार है | विचार से ही जगत् की सभी वस्तुओं की उत्पत्ति होती है | प्लेटों ने विचारों को मूलतत्व मानकर विचारों की नैतिक व्यवस्था को स्वीकारा | प्लेटों बताते है कि विचारों में एक ईश्वरीय व नैतिक व्यवस्था पायी जाती है, जिसकी मदद से ईश्वर इस सम्पूर्ण संसार को निर्मित करता है | प्लेटों का विचारों की नैतिक व्यवस्था में विश्वास रखने के कारण प्लेटों की आदर्शवादी विचारधारा को नैतिक आदर्शवाद कहा जाता है |

2. आत्मनिष्ठ आदर्शवाद  (Subjective Idealism)

आयरलैण्ड के आदर्शवादी दार्शनिक जार्ज बर्कले (George Berkeley) ने आत्मनिष्ठ आदर्शवाद  (Subjective Idealism) का प्रतिपादन किया था | जार्ज बर्कले ने बताया कि किसी भी वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान केवल मन अर्थात् आत्मा की वजह से होती है और वस्तु का खुद में कोई अस्तित्व नही होता | जार्ज बर्कले बताते है कि विश्व एक मानसिक जगत् है और यहाँ विचारों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है | जार्ज बर्कले की इस विचारधारा को आत्मनिष्ठ आदर्शवाद (Subjective Idealism) का नाम दिया गया है |

3. बुद्धिवादी आदर्शवादी ( Intellectual Idealism)

जर्मनी के आर्दशवादी दार्शनिक इमान्युएल कान्ट (Immanuel Kant) ने बुद्धिवादी आदर्शवादी ( Intellectual Idealism) का प्रतिपादन किया था | इमान्युएल कान्ट के अनुसार “बुद्धि प्रकृति को नियमित करती है |“ बुद्धि ही प्रकृति को नियमित करके उसे हमारे ज्ञान का विषय बनाने में मदद करती है | कान्ट का मानना है कि हमारे व्यावहारिक ज्ञान में सार्वभौम अनिवार्यता और निश्चय बुद्धि के कारण आती है | कान्ट की इस आदर्शवादी विचारधारा को बुद्धिवादी आदर्शवादी कहा जाता है |  

4. निरपेक्ष आदर्शवाद (Absolute Idealism)

जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हेगेल (George Wilhelm Friedrich Hegel) ने निरपेक्ष आदर्शवाद (Absolute Idealism) का प्रतिपादन किया था | हेगल का मानना है कि एकमात्र परमतत्व निरपेक्ष अथवा पूर्ण विचार है | पूरा विश्व इसी का परिणाम है | प्रत्येक पदार्थ इसी की सत्ता से अनुप्राणित है तथा स्वयं के सीमित रूप में उसी की अभिव्यक्ति करता है | फ्रेडरिक हेगेल की इस आदर्शवादी विचारधारा को निरपेक्ष आदर्शवाद कहा जाता है |

5. बहुतत्ववादी आदर्शवाद (Pluralistic Idealism)

जर्मनी के दार्शनिक गॉटफ्रिड विल्हेल्म लाइबनित्ज (Gottfried Wilhelm Leibnitz) ने बहुतत्ववादी आदर्शवाद (Pluralistic Idealism) का प्रतिपादन किया था | विल्हेल्म लाइबनित्ज ने संसार के प्रत्येक पदार्थ में एक स्वतंत्र आध्यात्मिक तत्व ‘चिदणु’ (Monad) की सत्ता को स्वीकार है | लाइबनित्ज के अनुसार यह संसार अनेक चिदाणु से निर्मित है | संसार में ऐसे असंख्य चिदाणु है | परम चिदाणु अर्थात् ईश्वर चिदाणुओं का सृष्टा है | लाइबनित्ज द्वारा अनेक चिदाणु की सत्ता स्वीकार करने के कारण उनकी आदर्शवादी विचारधारा को बहुतत्ववादी आदर्शवाद कहा जाता है | (हिन्दी में यूजीसी नेट 1 पेपर नोट्स पीडीएफ)

तत्वों के आधार पर आदर्शवाद के रूप

प्रकारप्रवर्तकतत्व
नैतिक आदर्शवादप्लेटोविचार
आत्मनिष्ट आदर्शवादबर्कलेमन अथवा आत्मा
बुद्धिवादी आदर्शवादीकान्टबुद्धि
निरपेक्ष आदर्शवाद  हेगेलपरमतत्व (जीवात्मा व प्रकृति दोनों)
बहुतत्ववादी आदर्शवादलाइबनित्जचिदणु (मोनाड)

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3. प्रकृतिवाद (Naturalism)

 प्रकृतिवाद पाश्चात्य  दर्शन कि वह विचारधारा है जो प्रकृति को सर्वोच्च बनता है | प्रकृतिवाद प्रकृति से संबंधित सिद्धांतों का अध्ययन है | प्रकृतिवाद में कृतिम या बनावटी जीवन शैली का कोई महत्व नहीं है | प्रकृतिवाद के अनुसार प्रकृति एक उत्तम शिक्षक है जो शिक्षा प्रकृति द्वारा प्राप्त होती है वही श्रेष्ठ शिक्षा है | प्रकृतिवाद के समर्थक विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा को उचित नहीं मानते हैं |  प्रकृतिवाद ने उस विचारधारा को मानने से इंकार कर दिया था, जो पुनर्जागरण काल में विकसित हुई थी की शिक्षा में पुस्तकें और पुस्तकीय ज्ञान निहित है | 

पॉल मोनरो के अनुसार प्रकृतिवाद पुनर्जागरण का नकारात्मक रूप था | हिंदी में यूजीसी नेट पेपर 1 अध्ययन सामग्री पीडीएफ (UGC Net Paper 1 Study Material PDF in Hindi)

प्रकृतिवाद के रूप (forms of naturalism)

  1. भौतिक प्रकृतिवाद (Physical Naturalism)
  2. यांत्रिक  प्रकृतिवाद (Mechanical Naturalism)
  3. जैविक प्रकृतिवाद (Biological Naturalism)

भौतिक प्रकृतिवाद (Physical Naturalism)

भौतिक प्रकृतिवाद में भौतिक व प्राकृतिक नियमों का अध्ययन किया जाता है | भौतिक प्रकृतिवाद में मानव का स्थान प्रकृति के समक्ष गौण होता है | भौतिक प्रकृतिवाद मानव को भौतिक जगत के अनुसार समझने का प्रयत्न करता है | हिंदी में यूजीसी नेट पेपर 1 अध्ययन सामग्री पीडीएफ (UGC NET 1st Paper Notes in Hindi PDF)

यांत्रिक  प्रकृतिवाद (Mechanical Naturalism)

यांत्रिक  प्रकृतिवाद या यन्त्रवादी प्रकृतिवाद (Mechanical Naturalism) सम्पूर्ण जगत को एक यंत्र के रूप में देखता है, जिसका निर्माण पदार्थ और गति द्वारा हुआ है | यांत्रिक  प्रकृतिवाद मानव को भी एक यंत्र मानता है जोकि बाहरी उत्तेजनाओं की प्रतिक्रिया स्वरुप क्रियाकलाप करते है | यांत्रिक प्रकृतिवाद ने व्यवहारवादी मनोविज्ञान (Behavioural Psychology) को जन्म दिया | यांत्रिक प्रकृतिवाद ने शिक्षा के क्षेत्र में अनुबंधित अनुक्रिया (Conditioned Response) व करके सीखना (Learning by Doing) जैसे प्रमुख सिद्धांतों को जन्म दिया |

जैविक प्रकृतिवाद (Biological Naturalism)

जैविक प्रकृतिवाद (Biological Naturalism) डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत पर आधारित है | जैविक प्रकृतिवाद के अनुसार मानव का विकास पशुओं से हुआ है अर्थात् मानव पशु का विकसित रूप है | इसलिए मानव व पशुओं में विकास की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है |

प्रकृतिवादी शिक्षा के क्षेत्र में रूसो का योगदान सर्वप्रमुख है | रूसो के बाद हरबर्ट स्पेंसर, बनार्ड शॉ, हक्सले, सैम्युल बटलर आदि प्रमुख है |

रूसों (Rousseau) का प्रमुख नारा था – “प्रकृति की ओर लौटों” रूसों के अनुसार बालकों को स्वयं अनुभव करके सीखना चाहिए | रूसों ने “ज्ञानेद्रियों द्वारा शिक्षा” और “स्वानुभव द्वारा सीखना” को सर्वप्रमुख माना | रूसों ने नकारात्मक शिक्षा (Negative Education) को सच्ची शिक्षा माना है |

प्रकृतिवाद ने शिक्षण की अनेक विधियों को विकसित किया, जिनमे ह्यूरिस्टिक विधि (Heauristic Method), डाल्टन विधि (Dalton Method), खेल विधि (Play way Method), मोंटेसरी विधि (Montessori Method), निरीक्षण विधि (Observation Method) प्रमुख है |

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4. प्रयोजनवाद (Pragmatism)

प्रयोजनवाद एक मानवतावादी दर्शन है जो मानव के केवल व्यावहारिक पक्ष पर विचार करती है | प्रयोजनवाद इस जगत और इस जगत की सभी वस्तुओं को विभिन्न क्रियाओं का परिणाम मानता है | इसीलिए प्रयोजनवाद को अर्थक्रियावाद और फलवाद भी कहा जाता है | प्रयोजनवाद मात्र उसी को सत्य मानता है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी हो और जिससे मानव के प्रयोजन की सिद्धि होती है | इसीलिए प्रयोजनवाद को उपयोगितावाद और व्यावहारिकतावाद भी कहते है |

प्रयोजनवाद का जन्म अमेरिका में हुआ था | प्रयोजनवादी विचारधारा के जनक अमेरिका के चार्ल्स सेंडर्स पीयर्स (Charles Sanders Peirce) को माना जाता है | पीयर्स के बाद विलियम जेम्स (William James), जॉन डीवी (John Dewey) और किलपैट्रिक (Kilpatrick) ने प्रयोजनवाद के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिए | इंग्लैंड में प्रयोजनवाद के विकास में एफ.सी.एस. शिलर (F.C.S. Schiller) ने विशेष योगदान दिया | इन सभी में जॉन डीवी का योगदान सर्वाधिक माना जाता है |

पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम (Curriculum and Syllabus)

पाठ्यचर्या शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है – पाठ्य और चर्या | यहाँ पाठ्य का अर्थ होता है “पढ़ने योग्य” या “पढ़ाने योग्य” जबकि चर्या का अर्थ होता है – “नियमपूर्वक अनुसरण” | अतः पाठ्यचर्या का अर्थ होता है – पढ़ने या पढ़ाने योग्य (सीखने या सिखाने योग्य) विषयवस्तु व क्रियाओं का नियमपूर्वक अनुसरण |

पाठ्यचर्या शिक्षा का अतिमहत्वपूर्ण अंग है जो छात्र व शिक्षक में मध्य एक कड़ी का कार्य करता है | पाठ्यचर्या दोनों (शिक्षक व शिक्षार्थी) की सीमाओं को निश्चित करता है | पाठ्यचर्या का निर्माण देश, काल, समाज की आवश्यकताओं, शिक्षार्थियों की रुचियों, योग्यताओं और आकांक्षाओं पर निर्भर करता है |

आपको बता दें कि पाठ्यचर्या शब्द लैटिन भाषा के क्यूरीकुलम (Curriculum) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है | क्यूरीकुलम शब्द लैटिन शब्द कर्रेर (Currere) से बना है जिसका अर्थ “दौड़ का मैदान” होता है | इसप्रकार शिक्षा की तुलना दौड़ से गयी है और जिसमे पाठ्यचर्या “दौड़ के मैदान” की तरह माना गया है | राबर्ट युलिच लिखते है कि “पाठ्यचर्या दौड़ का मैदान है, जिसपर व्यक्ति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दौड़ता है |”

पाठ्यक्रम का अर्थ पाठ्यचर्या से भिन्न होता है | पाठ्यक्रम पाठ्य (पठनीय वस्तु) का एक क्रम होता है | पाठ्यक्रम शब्द अंग्रेजी भाषा के सिलेबस (Syllabus) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है | सिलेबस (Syllabus) का अर्थ कोर्स ऑफ़ स्टडी (Course Of Study) या कोर्स ऑफ़ टीचिंग (Course Of Teaching) होता है | पाठ्यक्रम को पाठ्यसामग्री, पाठ्यविवरण, अंतर्वस्तु भी कहा जाता है |

वास्तव में पाठ्यक्रम अध्ययन और अध्यापन का एक मार्ग होता है (Curriculum is a pathway to study and teaching), जिसके अंतर्गत अध्ययन व अध्यापन की परिस्थितियां आयोजित की जाती है | Teaching aptitude notes in hindi pdf download |

पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम में अंतर (Difference Between Curriculum and Syllabus)

 पाठ्यचर्या (Curriculum)पाठ्यक्रम (Syllabus)
प्रवृति (Nature)निर्देशात्मक (Instructive)वर्णात्मक (Descriptive)
किसके लिएकोर्स के लिएविषय हेतु
विषय क्षेत्र (Scope)विस्तृत (Wide)संकुचित (Narrow)
कौन सेट करता है सरकार/उच्च संस्थानपरीक्षा बोर्ड
अवधि (Time Span) कोर्स समाप्ति तकनिश्चित-समान्यता 1 वर्ष
समरूपता (Uniformity)सभी शिक्षकों हेतु एकसमानविभिन्न शिक्षकों हेतु विभिन्न
Source : NCERT – Pedagogy of Science

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अधिगम (Learning)

सामान्य भाषा में अधिगम का अर्थ सीखना (Learning) होता है | अधिगम जीवन-पर्यन्त चलने वाली एक सतत् प्रक्रिया है | वुडवर्थ के अनुसार,”नवीन ज्ञान व नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया अधिगम की प्रक्रिया है |”

अधिगम के प्रकार (Kinds of Learning)

उसुबेल के अनुसार (According to Ausubel)

उसुबेल के अनुसार अधिगम के प्रकार निम्न है –

  1. अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful Learning)
  2. अन्वेषण अधिगम (Discovery Learning)
  3. अभिग्रहण अधिगम (Receptional Learning)
  4. रटंत अधिगम (Rote Learning)

अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful Learning)

अर्थपूर्ण अधिगम उस अधिगम (सीखना) को कहते है, जिसमे अधिगमकर्ता सीखी जाने वाली विषयवस्तु के मूल तथ्यों का नियम के अनुसार अर्थ ग्रहण करके समझने का प्रयत्न करता है साथ ही पूर्व ज्ञान से उसका सम्बन्ध जोड़कर सीखता (अधिगम) है | अतः अर्थपूर्ण अधिगम अधिगमकर्ता के लिए सहज हो जाता है |

अन्वेषण अधिगम (Discovery Learning)

अन्वेषण अधिगम (Discovery Learning) में अधिगमकर्ता को दी गयी विषय-वस्तु से नये विचार/नियम/संप्रत्यय की खोज करके सीखना (अधिगम) होता है | उसुबेल बताते है कि अन्वेषण सीखना अर्थपूर्ण और रटकर भी हो सकता है |

अभिग्रहण अधिगम (Receptional Learning)

अभिग्रहण अधिगम (Receptional Learning) में अधिगमकर्ता को लिखकर या बोलकर सीखने वाली विषय-वस्तु प्रदान की जाती है | इसके बाद अधिगमकर्ता को कहा जाता है कि वह उस विषय-वस्तु को आत्मसात करें | इसप्रकार अधिगमकर्ता दी गयी विषय-वस्तु को आत्मसात करके सीख लेता है |

रटंत अधिगम (Rote Learning)

रटंत अधिगम (Rote Learning) ज्यादा प्रभावी नही माना जाता है | रटंत अधिगम (Rote Learning) में अधिगमकर्ता दी गयी विषय-वस्तु को बिना उसका अर्थ समझे सीख लेता है |

गेने के अनुसार (According to Gagne)

गेने (Gene) ने अपनी पुस्तक द कंडीशन्स ऑफ़ लर्निंग (The Conditions of Learning) में अधिगम के आठ प्रकार बताये है, जिसे गेने ने निष्पादन परिवर्तन कहा है |

गैने के अनुसार अधिगम के प्रकार निम्न है –

  1. सांकेतिक अधिगम (Signal Learning)
  2. सरल श्रृंखला अधिगम (Simple Chaining Learning)
  3. नियम अधिगम (Rule Learning)
  4. उद्दीपन-अनुक्रिया अधिगम (Stimulus Response Learning)
  5. संप्रत्यय अधिगम (Concept Learning)
  6. शाब्दिक साहचर्य अधिगम (Verbal Association Learning)
  7. विभेदीकरण अधिगम (Discrimination Learning)
  8. समस्या-समाधान अधिगम (Problem Solving Learning)

सांकेतिक अधिगम (Signal Learning)

सांकेतिक अधिगम (Signal Learning) के अंतर्गत पावलाव का क्लासिकल अनुबन्ध अधिगम (Pavlov’s Classical Conditioning Learning) आता है | सांकेतिक अधिगम में कोई स्वाभाविक उद्दीपन किसी तटस्थ उद्दीपन के साथ कई बार एक साथ दिया जाता है | इसके फलस्वरूप अधिगमकर्ता वैसी ही अनुक्रिया करके सीख लेता है |

सरल श्रृंखला अधिगम (Simple Chaining Learning)

सरल श्रृंखला अधिगम (Simple Chaining Learning) का उदाहरण “कार चलाना सीखना” है | सरल श्रृंखला अधिगम में अधिगमकर्ता कई छोटी छोटी अनुक्रियाओं को एक सरल श्रृंखला के रूप में करता है | जब वें सभी अनुक्रियाएँ परस्पर समन्वित होती है तो अधिगमकर्ता का अभीष्ट अधिगम पूरा हो जाता है |

नियम अधिगम (Rule Learning)

नियम अधिगम (Rule Learning) का उदाहरण है – व्याकरण, विज्ञान आदि के नियमों को सीखना | नियम अधिगम में अधिगमकर्ता को सिद्धांत, नियम के आधार पर दी गयी विषयवस्तु को सीखना होता है | नियम अधिगम को महासंप्रत्यय (Super Concept) भी कहा जाता है क्योकि नियम की शाब्दिक रूप में भी अभिव्यक्ति हो सकती है | नियम अधिगम में दो अथवा दो से अधिक संप्रत्ययों को श्रृंखलाबद्ध किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप एक नियम की संकल्पना जन्म लेती है, जैसे ‘पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति मौजूद है |’

उद्दीपन-अनुक्रिया अधिगम (Stimulus Response Learning)

उद्दीपन-अनुक्रिया अधिगम (Stimulus Response Learning) के अंतर्गत स्किनर का क्रियाप्रसूत अनुबंध अधिगम (Skinner’s Operant Conditioning Learning) आता है | उद्दीपन अनुक्रिया अधिगम में अधिगमकर्ता द्वारा किसी उद्दीपक के प्रति एक ऐच्छिक अनुक्रिया किया जाता है | अगर इसका परिणाम सुखद आता है तो अधिगमकर्ता धीरे-धीरे उस उद्दीपन के प्रति वही अनुक्रिया करना सीख लेता है | NTA UGC study material free download in hindi

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संप्रत्यय अधिगम (Concept Learning)

संप्रत्यय अधिगम (Concept Learning) में अधिगमकर्ता भिन्न भिन्न जीवों या तथ्यों या वस्तुओं के सामान्य गुणों पर आधारित किसी विशेष अर्थ का संप्रत्यय सीखता है | उदाहरण – संक्रमण रोग, जंगली जानवर आदि |

शाब्दिक साहचर्य अधिगम (Verbal Association Learning)

शाब्दिक साहचर्य अधिगम (Verbal Association Learning) का उदाहरण है – कविता पाठ करना | शाब्दिक साहचर्य अधिगम में अधिगमकर्ता उद्दीपन अनुक्रिया का एक क्रम सीखता है, जिसमे शाब्दिक अभिव्यक्ति मौजूद रहती है |

विभेदीकरण अधिगम (Discrimination Learning)

विभेदीकरण अधिगम (Discrimination Learning) का उदाहरण है – त्रिभुज और चतुर्भुज में विभेद करना सीखना | विभेदीकरण अधिगम में अधिगमकर्ता अलग अलग उद्दीपनों के प्रति अलग अलग अनुक्रियाओं को करना सीखता है |

समस्या-समाधान अधिगम (Problem Solving Learning)

समस्या-समाधान अधिगम (Problem Solving Learning) का उदाहरण है – गणित की किसी समस्या का समाधान | समस्या-समाधान अधिगम में अधिगमकर्ता किसी नियम के अनुसार दी गयी समस्या के समाधान की खोज करता है | इससे वह खुद किसी नये तथ्य को सीखने का प्रयत्न करता है | समस्या-समाधान अधिगम में चिन्तन की सामग्री निहित होती है | NTA UGC NET paper 1 teaching aptitude notes in hindi |

अधिगम की प्रक्रिया में सोपान

देशील (Dashiell) ने अधिगम प्रक्रिया के 6 सोपान बताये है –

  1. अभिप्रेरणा
  2. उद्देश्य
  3. बाधा
  4. उद्देश्य प्राप्ति के लिए विभिन्न अनुक्रियायें
  5. सबलीकरण (Reinforcement)
  6. सामान्यीकरण अथवा एकीकरण

ये भी देखें – भारत में बेरोजगारी के प्रकार

अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing Learning)

शारीरिक कारक

  1. ज्ञानेन्द्रियाँ
  2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य
  3. परिपक्वता (Maturity)

मनोवैज्ञानिक कारक

  1. प्रेरणा व अधिगम
  2. रूचि व रुझान (Interest and Aptitude)
  3. अधिगम की इच्छा
  4. बुद्धि

पर्यावरण सम्बन्धी कारक

वातावरण

अन्य कारक

  1. विषय सामग्री का स्वरुप
  2. अधिगम की विधियाँ
  3. अभ्यास
  4. सफलता का ज्ञान

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सीखने के वक्र (Curves of Learning)

सीखने के वक्र का अर्थ व परिभाषा (Definition and Meaning of Curves of Learning)

जब हम किसी कार्य को सीखते है तो सीखने की गति शुरू से लेकर अंत तक एक समान न होकर भिन्न-भिन्न रहती है | हमारे सीखने की गति कभी धीमी, कभी तेज और कभी तो बिल्कुल ही रुक जाती है | यदि हम अपनी सीखने की गति को एक ग्राफ पेपर पर अंकित करे, तो हमे सीखने की उन्नति अथवा अवनति को प्रदर्शित करती हुई एक वक्र रेखा दिखाई देगी | इसी को सीखने का वक्र (Curves of Learning) कहा जाता है | Teaching aptitude concept in hindi |

सीखने की वक्र रेखा किसी व्यक्ति की सीखने की उन्नति व अवनति को दर्शाती है | गेट्स और अन्य (Gates and Others) के अनुसार, “सीखने के वक्र अभ्यास के द्वारा सीखने की मात्रा, गति व प्रगति की सीमा को ग्राफ पर प्रदर्शित करते है |”

सीखने के वक्र में 3 मुख्य तत्व देखे जाते है – 1. प्रारम्भिक तीव्रता, 2. पठार, 3. शारीरिक सीमा |

सीखने की वक्र रेखाओं के प्रकार (Kinds of Learning Curves)

सीखने के वक्र रेखाओं (Curves of Learning) के तीन प्रकार है –

  1. उन्नतोदर वक्र (Convex Curve)
  2. नतोदर वक्र (Concave Curve)
  3. मिश्रित वक्र रेखा (Combination Type of Curve)

उन्नतोदर वक्र (Convex Curve)

उन्नतोदर वक्र रेखा (Convex Curve) में शुरू में सीखने की गति तीव्र होती है लेकिन इसके बाद सीखने की गति क्रमशः धीमी होती जाती है | इस तरह के सीखने में शुरू में उत्साह अधिक देखा जाता है लेकिन अंत में वक्र पठार का रूप ले लेता है |

नतोदर वक्र (Concave Curve)

नतोदर वक्र में शुरू में सीखने की गति मंद होती है लेकिन बाद में धीरे धीरे सीखने की गति तेजी होती है |

मिश्रित वक्र रेखा (Combination Type of Curve)

यह उन्नतोदर वक्र और नतोदर वक्र को मिश्रित करता है | मिश्रित वक्र रेखा (Combination Type of Curve) में शुरू में में सीखने की गति मंद, इसके बाद तेज हो जाती है, इसके बाद कुछ समय तक सीखने की गति तेज ही रहती है लेकिन इसके बाद क्रमशः सीखने की गति पुनः मंद होने लगती है | इस प्रकार शुरू में प्रगति तेज व बाद में धीमी हो सकती है | मिश्रित वक्र रेखा (Combination Type of Curve) ग्राफ पेपर पर अंग्रेजी के S (एस) अक्षर जैसी दिखती है | UGC NET first paper notes in hindi pdf download |

सीखने के वक्र का शिक्षा में महत्व

सीखने के वक्र का शिक्षा में अत्यधिक महत्व है | शिक्षा में सीखने के वक्र की उपयोगिता इस प्रकार है –

  1. एक शिक्षक सीखने के वक्र का अध्ययन करके अपने शिक्षार्थी की सामान्य प्रगति की जानकारी प्राप्त कर सकता है |
  2. शिक्षक सीखने के वक्र को देखकर सीखने की विषय-वस्तु का उचित तरीके से संगठन कर सकता है |
  3. शिक्षक सीखने के वक्र को देखकर उपयुक्त शिक्षण-विधि का उपयोग कर ‘सीखने के पठार’ को रोक सकता है |

सीखने के पठार (Plateaus of Learning)

सीखने के पठार का अर्थ (Meaning of Plateaus of Learning)

सीखने के पठार (Plateaus of Learning) उस अवधि को कहते है जब सीखने की प्रक्रिया में कोई उन्नति नही होती अर्थात् सीखने की प्रक्रिया में उन्नति बिल्कुल रूक जाती है | सीखने की क्रिया में उन्नति का रूक जाना ही ‘सीखने का पठार’ कहलाता है | सीखने के पठार सीखने की गति में अवरोध पैदा करते है | Teaching aptitude notes in hindi ugc net |

रॉस (Ross) लिखते है कि, “सीखने की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार (सीखने के पठार) है, जो उस अवधि को दर्शाते है, जब सीखने की प्रक्रिया में कोई उन्नति नही होती है |”

मनोवैज्ञानिक हालिंगवर्थ ने सीखने के पठार के कई कारण बताये है | हालिंगवर्थ लिखते है कि सीखने के पठारों के कई अर्थ हो सकते है जैसे-

  1. शिक्षार्थी ने उस समय उचित परिश्रम करना बंद कर दिया है | अथवा
  2. शिक्षार्थी ने ऐसी विधि अपना ली है जिसके द्वारा और अधिक उन्नति नही की जा सकती है | अथवा
  3. शिक्षार्थी के उत्साह में कमी आ गयी है या फिर शिक्षार्थी की प्रेरणा की तीव्रता में कमी आ गयी है | अथवा
  4. उन्नति तो हो रही हो लेकिन कुछ उस तरह से हो रही हो कि उसे स्पष्ट तरह से नापा नही जा सकता |

सीखने के पठार के कारण

जैसा कि हालिंगवर्थ ने बताया था कि सीखने के पठार (Plateaus of Learning) के अलग अलग कारण हो सकते है | सीखने के पठार के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित है –

  1. ज्ञानावरोध (Knowledge)
  2. थकान, अस्वस्थता, सीखने में मन न लगना
  3. उत्साहावरोध अथवा प्रेरणा की सीमा (Motivation Limit)
  4. बुद्धिलब्धि में कमी अथवा मंदबुद्धि होना
  5. शारीरिक क्षमतावरोध अथवा सीमा (Physiological Limit)
  6. सीखने की अनुचित विधियों का प्रयोग
  7. सीखने की उचित विधि को स्थायी रूप से अपनाने में कमी होना

सीखने के पठारों का निराकरण (Elimination of Plateaus of Learning)

  1. सीखने की उत्तम व रोचक विधियों का उपयोग करना चाहिए |
  2. सीखने की प्रक्रिया में एक क्रम होना चाहिए | सीखने में रूचि, सरलता, जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए |
  3. सीखने वाले को समय-समय पर समुचित प्रेरणा व प्रोत्साहन देते रहना चाहिए |
  4. किसी कार्य को कुछ समय तक सीखने के पश्चात थोडा आराम देना चाहिए |
  5. सीखने वाले की शारीरिक क्षमता व व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर समुचित ध्यान देना चाहिए |
  6. सीखने के लिए सीखने में व्यवधान न डालने वाले उपयुक्त वातावरण की व्यवस्था की जानी चाहिए |
  7. सीखने के दौरान होने वाले थकान, व्यवधान आदि दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए |

शिक्षण (Teaching)

शिक्षा, जोकि जीवनपर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रियां है, में मुख्य रूप से शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यचर्या केंद्र-बिंदु होते है | शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यचर्या में स्थापित किया जाने वाला सम्बन्ध शिक्षण होता है | शिक्षक शिक्षण में पाठ्यचर्या के माध्यम से शिक्षार्थी के लिए शिक्षण (Teaching) करता है | अतः शिक्षक व शिक्षार्थी के मध्य चलने वाली अन्तः क्रिया शिक्षण कहलाती है |

दूसरे शब्दों में “शिक्षण एक ऐसी अन्तःप्रक्रिया है, जो शिक्षण व शिक्षार्थी के बीच विशेष कार्य के लिए संचालित होती है |” शिक्षण के लिए कम से कम एक शिक्षक व एक शिक्षार्थी का होना आवश्यक होता है |

रायबर्न (Ryburn) शिक्षण के अर्थ को बताते हुए लिखते है कि, “शिक्षण एक सम्बन्ध है, जो शिक्षार्थी को स्वयं की सभी शक्तियों का विकास करने में सहायता देता है |” Teaching aptitude notes pdf free download |

ये भी देखें – UPSESSB UP PGT History Study Material

शिक्षण की विशेषताएं (Characteristics of Teaching)

  1. शिक्षण सुनियोजित होता है |
  2. शिक्षण में शिक्षार्थी सक्रिय व क्रियाशील रहता है |
  3. शिक्षण निर्देशात्मक होता है |
  4. शिक्षण स्मृति स्तर से चिन्तन स्तर तक का होता है |
  5. शिक्षण प्रगतिशील और प्रेरणादायक होता है |

शिक्षण के प्रकार

शिक्षण के उद्देश्यों की दृष्टि से –

  1. ज्ञानात्मक शिक्षण
  2. भावात्मक शिक्षण
  3. क्रियात्मक शिक्षण

शिक्षण के स्तरों की दृष्टि से –

  1. स्मृति स्तर
  2. बोध स्तर
  3. चिन्तन स्तर

शिक्षण के स्वरुप की दृष्टि से –

  1. वर्णनात्मक शिक्षण
  2. उपचारात्मक शिक्षण

शासन के अनुसार शिक्षण के रूप –

  1. एक तांत्रिक शिक्षण
  2. प्रजातांत्रिक शिक्षण
  3. हस्तक्षेप रहित शिक्षण

शिक्षण की व्यवस्था की दृष्टि से –

  1. औपचारिक शिक्षण
  2. अनौपचारिक शिक्षण

शिक्षण की क्रियाओं की दृष्टि से

  1. प्रस्तुतिकरण
  2. प्रदर्शन
  3. कार्य करना

उपरोक्त “हिंदी में यूजीसी नेट 1 पेपर नोट्स पीडीएफ” अन्य परीक्षा जैसे “यूपी पीजीटी शिक्षाशास्त्र नोट्स पीडीएफ”, “हिंदी में यूजीसी नेट पेपर 2 शिक्षाशास्त्र नोट्स पीडीएफ”, “बीएड स्टडी मटेरियल” “डीएलएड (बीटीसी) नोट्स इन हिंदी” आदि के लिए समान रूप से उपयोगी है |

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