Shiksha Ke Prakar : Types of Education | शिक्षा के प्रकार

Types of Education

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार (Type of Education) या शिक्षा के रूप (Form of Education) को समझने से पहले हम समझेंगें की शिक्षा क्या है ? (शिक्षा का अर्थ क्या है ?) (What is Education ?) Shiksha Ke Prakar शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है | यद्यपि संकुचित में शिक्षा का अर्थ एक बालक को विद्यालय में दी जाने वाली शिक्षा से है | इस रूप शिक्षा विशेष शिक्षण, विशेष पाठ्यक्रम, विशेष विद्यालय, विशेष काल और विशेष पद्यति तक निश्चित हो जाती है, जिसमे बालक (बालक) को शिक्षा निश्चित क्रम में एक निश्चित व्यक्ति (शिक्षक) द्वारा प्रदान की जाती है | Shiksha Ke Prakar लेकिन व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवनपर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रिया है (Education is a life long process) अर्थात् एक व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक जो-कुछ सीखता और अनुभव करता है वह सब व्यापक अर्थ में शिक्षा के अंतर्गत आता है |

इस प्रकार एक व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन-काल उसका शिक्षा-काल माना जाता है | अपने जीवन काल में हर व्यक्ति दूसरे से कुछ-न-कुछ सीखता है और दूसरे को कुछ-न-कुछ सिखाता है | इसलिए वास्तव में इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षार्थी भी है और शिक्षक भी है |

Shiksha Ke Prakar शिक्षा मानव विकास की मूल साधन है | मानव विकास की यह प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवनपर्यन्त निरंतर चलती रहती है और निरंतर मानव व्यवहार में परिवर्तन लाती रहती है | जिससे मानव सभ्य, सुसंस्कृत और सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होता है |

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इस प्रकार शिक्षा एक सामाजिक, व्यापक और जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है | जहाँ तक शिक्षा के प्रकार (Shiksha Ke Prakar) का प्रश्न है, शिक्षा भिन्न-भिन्न रूपों व प्रकारों में समाज में कार्यरत है | व्यवस्था, उद्देश्य, विषय, लक्ष्य, साधन, स्थान, समय, वातावरण आदि की दृष्टिकोण से शिक्षा के कई रूप (शिक्षा के कई प्रकार) है |

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार (शिक्षा के रूप) : Types of Education (Form of Education)

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार (शिक्षा के रूप) इस प्रकार है –

  1. प्रत्यक्ष शिक्षा और अप्रत्यक्ष शिक्षा : Direct Education and Indirect Education
  2. सकारात्मक शिक्षा और नकारात्मक शिक्षा : Positive Education and Negative Education
  3. सामान्य शिक्षा और विशिष्ट शिक्षा : General Education and Specific Education
  4. एकांगी शिक्षा और सर्वांगीण शिक्षा : One-sided Education and Harmonious Education
  5. वैयक्तिक शिक्षा और सामूहिक शिक्षा : Individual Education and Group Education
  6. औपचारिक शिक्षा और अनौपचारिक शिक्षा : Formal Education and Informal Education

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार

प्रत्यक्ष शिक्षा और अप्रत्यक्ष शिक्षा : Direct Education and Indirect Education

सबसे पहले हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शिक्षा के बीच के अंतर (difference between direct and indirect education) को समझेंगें –

प्रत्यक्ष शिक्षा क्या है : What is Direct Education

प्रत्यक्ष शिक्षा को हम “वैयक्तिक शिक्षा” (Personal Education) भी कहते है |

प्रत्यक्ष शिक्षा (direct education) वह शिक्षा है, जिसमे शिक्षक के आदर्श, कौशल, ज्ञान, उद्देश्य और शिक्षा से शिक्षार्थी सीधा प्रभावित होता है | यह शिक्षा की द्विमुखी प्रक्रियां (द्विमुखी प्रक्रिया में शिक्षा के दो ध्रुव होते है – पहला वो जो प्रभावित करता है अर्थात् शिक्षक और दूसरा वह जो प्रभावित होता है अर्थात् शिक्षार्थी) है, जिसमे शिक्षार्थी के ऊपर शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है |

प्रत्यक्ष शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से शिक्षक (educator/teacher) और शिक्षार्थी (educand/student) के मध्य चलती है जिसमे एक पूर्व-निश्चित योजना, पूर्व-निश्चित उद्देश्य व पूर्व-निश्चित शिक्षण विधियों के द्वारा शिक्षा का आदान-प्रदान होता है |

प्रत्यक्ष शिक्षा में शिक्षार्थी, शिक्षक के प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहने के कारण उसके व्यक्तित्व से सीधे प्रभावित होता है | अतः प्रत्यक्ष शिक्षा शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य होने वाले प्रभाव के आदान-प्रदान पर आधारित है |

इस प्रकार “प्रत्यक्ष शिक्षा वह शिक्षा है जिसमे शिक्षक प्रत्यक्ष रूप से अपने ज्ञान, आदर्श, उद्देश्य, शिक्षण-कौशल से शिक्षार्थी के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है |”

अप्रत्यक्ष शिक्षा क्या है ? : What is Indirect Education ?

अप्रत्यक्ष शिक्षा को हम “अवैयक्तिक शिक्षा” (Impersonal Education) भी कहते है |

अप्रत्यक्ष शिक्षा (indirect education) वह शिक्षा है जिसमे शिक्षार्थी अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त करता है | इसमे शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित नही होता है | वास्तव में अप्रत्यक्ष शिक्षा स्वतंत्र वातावरण (free environment) में अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा स्वयं ही संचालित होती है |

अप्रत्यक्ष शिक्षा में न कोई पूर्व-योजना होती है और न ही कोई निश्चित उद्देश्य, बल्कि इसमे शिक्षार्थी को अपनी इच्छानुसार प्रगति करने की स्वतंत्रता होती है |

अप्रत्यक्ष शिक्षा किसी विशेष व्यक्ति के द्वारा किसी विशेष स्थान में व विशेष उद्देश्य के लिए नही दी जाती है | इस शिक्षा में बालक को अपनी इच्छानुसार सीखने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है |

इस प्रकार हम कह सकते है कि “अप्रत्यक्ष शिक्षा वह शिक्षा है, जो अप्रत्यक्ष साधनों के प्रयोग से शिक्षार्थी को प्रभावित करती है |”

वास्तव में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शिक्षा परस्पर एक दूसरे की पूरक (compliment) होती है, एक के बिना दूसरी शिक्षा अधूरी होती है | एक शिक्षार्थी अप्रत्यक्ष रूप से जो कुछ सीखता है उसे व्यवस्थित व व्यवहारिक बनाने के लिए प्रत्यक्ष शिक्षा की आवश्यकता होती है |

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सकारात्मक शिक्षा और नकारात्मक शिक्षा : Positive Education and Negative Education

सकारात्मक शिक्षा क्या होती है ? (What is Positive Education ?)

सकारात्मक शिक्षा को निश्चयात्मक शिक्षा भी कहते है |

सकारात्मक शिक्षा या निश्चयात्मक शिक्षा वह शिक्षा है, जिसमे शिक्षक बालक के समक्ष पूर्व-निश्चित उद्देश्यों व लक्ष्यों की पूर्ति के लिए कुछ आदर्श वाक्य (जैसे नैतिकता का पालन करों, असत्य न बोलों, अहिंसा का पालन करों, धर्म का मार्ग अपनाओं, पृथ्वी गोल है, पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर लगती है आदि) प्रस्तुत करता है और बालक से इनका पालन करने की अपेक्षा रखता है |

सकारात्मक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षार्थी पूर्व निश्चित तथ्यों और आदर्शों को बिना किसी तर्क या अनुभव के स्वीकार करता है |

इस प्रकार सकारात्मक शिक्षा (Positive Education) में शिक्षक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है और बालक को स्वतंत्रता व अपने अनुभवों के साथ सीखने का अवसर नही मिलता है |

अतः हम कह सकते है कि “सकारात्मक शिक्षा वह शिक्षा है, जिसमे शिक्षक, शिक्षार्थी के समक्ष पूर्व-निश्चित उद्देश्यों व लक्ष्यों की पूर्ति के लिए कुछ आदर्श वाक्य प्रस्तुत कर उनसे उन्हें पालन करने की अपेक्षा करता है |”

सकारात्मक शिक्षा को आदर्शवादी शिक्षा (Idealistic Education) भी कहते है क्योकि यह पूर्व-निश्चित उद्देश्यों, तथ्यों, लक्ष्यों, आदर्शों आदि पर आधारित होती है |

नकारात्मक शिक्षा क्या होती है ? (What is Negative Education ?)

नकारात्मक शिक्षा (Negative Education) वह शिक्षा है, जिसमे शिक्षार्थी स्वानुभव तथा स्वक्रिया द्वारा बिना किसी पूर्व-निश्चित उद्देश्यों, पूर्व-निश्चित योजना या पूर्व-निश्चित आदर्शों के शिक्षा प्राप्त करता है | इस शिक्षा में शिक्षक केवल इन तथ्यों की खोज व आदर्शों के निर्माण में शिक्षार्थी का दिशा-निर्देशक व सहायक होता है |

नकारात्मक शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा भी कहते है |

प्रकृतिवादी शिक्षाशास्त्री जीन जैक्स रूसो ने सकारात्मक शिक्षा के विपरीत नकारात्मक शिक्षा (निषेधात्मक शिक्षा) का प्रतिपादन किया था |

नकारात्मक शिक्षा में शिक्षार्थी की वैयक्तिक भिन्नता (individual difference) के आधार पर ‘स्व-क्रिया’ (Self activity) और ‘स्वानुभव’ (Self Experiment) द्वारा सीखने पर बल दिया जाता है |

नकारात्मक शिक्षा मुख्यरूप से शिक्षार्थी-केन्द्रित होती है और इसमे शिक्षक मात्र मार्गदर्शक होता है | यह शिक्षा स्वाभाविक रूप से चलती है औए इसमे शिक्षार्थी की ज्ञानेन्द्रियों के विकास पर जोर दिया जाता है |

इस हम कह सकते है कि “नकारात्मक शिक्षा वह शिक्षा होती है जिसमे शिक्षार्थी बिना किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य, पूर्व निश्चित शिक्षा योजना, पूर्व निश्चित आदर्शों के स्व-क्रिया व स्वानुभव से शिक्षा प्राप्त करते है |”

अतः नकारात्मक शिक्षा में शिक्षक का स्थान गौण और बालक का प्रधान होता है | इस शिक्षा में बालक को उसकी इच्छानुसार सीखने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है और शिक्षक केवल उसका सहायक मात्र होता है |

सकारात्मक और नकारात्मक शिक्षा के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नकारात्मक शिक्षा के द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी होता है | नकारात्मक शिक्षा शिक्षार्थी को स्वयं करके सीखने व अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है |

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सामान्य शिक्षा और विशिष्ट शिक्षा : General Education and Specific Education

सामान्य शिक्षा क्या होती है ? (What is General Education ?)

सामान्य शिक्षा (General Education) वह शिक्षा है, जो शिक्षार्थी को, बिना किसी विशेष उद्देश्य के, सामान्य जीवन-यापन के लिए तैयार करती है |

सामान्य शिक्षा को उदार शिक्षा (Liberal Education)  भी कहते है | इसके द्वारा शिक्षार्थी (बालक) को समाज में व्यवहारिक ज्ञान, मातृभाषा, रहन-सहन आदि सिखाया जाता है |

सामान्य शिक्षा वह शिक्षा कहलाती है जो समुदाय में होने वाले परिवर्तनों के परिणामों के साथ समायोजन कराने में सहायता करती है | यह शिक्षा बालक को व्यवहारिक ज्ञान देकर सभ्य नागरिक बनाती है |

इसप्रकार सामान्य शिक्षा प्राप्त करने से शिक्षार्थी (बालक) में बौद्धिक एवं सामाजिक-गुणों का विकास होता है और वह समाज में सहज रूप से समायोजन करने में सफल होता है |

इस प्रकार हम कह सकते है कि “सामान्य शिक्षा शिक्षार्थी को बिना किसी निश्चित उद्देश्य के मात्र उसके बौद्धिक विकास के लिए दी जाती है |”

सामान्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल शिक्षार्थी की सामान्य बुद्धि को तीव्र करना होता है, न कि उन्हें किसी विशेष व्यवसाय के लिए तैयार करना |

विशिष्ट शिक्षा क्या होती है ? (What is Specific Education ?)

विशिष्ट शिक्षा (Specific Education) वह शिक्षा है जो किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखकर शिक्षार्थी को प्रदान की जाती है |

विशिष्ट शिक्षा (Specific Education) को व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) भी कहते है, क्योकि विशिष्ट शिक्षा का उद्देश्य बालक को किसी विशेष व्यवसाय के लिए तैयार करना होता है |

विशिष्ट शिक्षा हमेशा किसी विषय-विशेष को केंद्र में रखकर दी जाती है जिसमे शिक्षार्थी को किसी निश्चित कार्य या व्यवसाय-विशेष के लिए तैयार किया जाता है | वास्तव में यह शिक्षा समाज में विशेषज्ञों को तैयार करती है |

इस प्रकार हम कह सकते है कि “विशिष्ट शिक्षा वह शिक्षा है जो किसी विशेष लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, अर्थात् किसी निश्चित व्यवसाय या निश्चित कार्य के लिए, बालक को प्रदान की जाती है |”

विशिष्ट शिक्षा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों का निर्माण करती है और देश की आर्थिक उन्नति में सहायता प्रदान करती है |

विशिष्ट शिक्षा (Specific Education) बालक में सृजनात्मक शक्ति (Creative Power) का विकास करती है और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों का निर्माण करती है | शिक्षार्थी को डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, अध्यापक आदि की शिक्षा प्रदान करना विशिष्ट शिक्षा का उदाहरण है |

वास्तव में सामान्य और विशिष्ट दोनों ही प्रकार की शिक्षा की बालक के जीवन को आवश्यकता होती है | बालक को सभ्य नागरिक के लिए सामान्य शिक्षा प्रयास करती है वही विशिष्ट शिक्षा बालक को भौतिक सुखों की प्राप्ति में सहायक होती है |

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार वीडियो | Types of Education Video

Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार को और अधिक समझने के लिए आप विद्यादूत के यूट्यूब विडियोशिक्षा के प्रकार (Shiksha Ke Prakar) को देख सकते है |

एकांगी शिक्षा और सर्वांगीण शिक्षा : One-sided Education and Harmonious Education

एकांगी शिक्षा क्या होती है ? (What is One-sided Education)

एकांगी शिक्षा (One-sided Education) वह शिक्षा है जिसमे शिक्षार्थी के व्यक्तित्व के किसी एक विशेष पक्ष के विकास पर पूर्णतया ध्यान दिया जाता है |

जैसा कि हमे मालूम है कि व्यक्तित्व के चार पक्ष होते है, पहला शारीरिक, दूसरा बौद्धिक, तीसरा भावात्मक और चौथा सामाजिक | एकांगी शिक्षा में शिक्षक, शिक्षार्थी के व्यक्तित्व के इन चारो पक्षों में से किसी एक पक्ष-विशेष के विकास पर जोर देता है तथा अन्य तीन पक्षों के विकास की उपेक्षा करता है |

इस प्रकार हम कह सकते है कि “एकांगी शिक्षा (One-sided Education) वह शिक्षा होती है जो बालक के व्यक्तित्व के किसी एक विशेष पक्ष पर अधिक ध्यान देकर उसी के विकास पर जोर देती है |”

एकांगी शिक्षा (One-sided Education) के द्वारा बालक के व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष पर जोर देने के कारण उसके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नही हो पता है | इसलिए यह शिक्षा बालक को वास्तविक जीवन जीने के योग्य बनाने में असफल रहती है |

सर्वांगीण शिक्षा क्या होती है ? (What is Harmonious Education ?)

सर्वांगीण शिक्षा (Harmonious Education) वह शिक्षा है जिसमे शिक्षार्थी के व्यक्तित्व के सभी चारो पक्षों के विकास पर समान रूप से ध्यान दिया जाता है |

सर्वंगीण शिक्षा (Harmonious Education) को आदर्श शिक्षा (Ideal Education) भी कहा जाता है |

सर्वांगीण शिक्षा बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास (Harmonious Development) पर पूर्णतया जोर देती है |

वर्तमान समय में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास को माना जाता है और सर्वांगीण शिक्षा को सर्वथा उपयुक्त माना जाता है |

सर्वांगीण शिक्षा (Harmonious Education) व्यक्ति, समाज, राज्य व राष्ट्र के लिए हितकारी व उपयुक्त मानी जाती है | 

एकांगी शिक्षा और सर्वांगीण शिक्षा (One-sided Education and Harmonious Education) के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि एकांगी शिक्षा बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर योगदान नही देती है और यह बालक को वास्तविक जीवन के अनुकूल बनाने में असफल सिद्ध होती है वही सर्वांगीण शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है |

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वैयक्तिक शिक्षा और सामूहिक शिक्षा : Individual Education and Group Education

अब हम वैयक्तिक और सामूहिक शिक्षा के अंतर को समझेंगे (Difference between Individual and Group Education)

वैयक्तिक शिक्षा क्या होती है ? (What is Individual Education ?)

वैयक्तिक शिक्षा (Individual Education) वह शिक्षा होती है जो एक समय में केवल शिक्षार्थी को उसकी रूचि, योग्यता और वैयक्तिक-भिन्नता (Individual Difference) को ध्यान में रखकर वैयक्तिक (व्यक्तिगत) रूप से प्रदान की जाती है |

वैयक्तिक शिक्षा में शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित होता है, जिससे शिक्षक को अपने शिक्षार्थी की प्रगति और कमियों की जानकारी निरन्तर होती रहती है |

वैयक्तिक शिक्षा में शिक्षक, शिक्षार्थी की वैयक्तिक भिन्नता के अनुसार शिक्षण-विधियों का प्रयोग करता है |

इस प्रकार “वैयक्तिक शिक्षा वह शिक्षा होती है जिसमे एक समय में केवल एक शिक्षार्थी को उसकी वैयक्तिक भिन्नता को ध्यान में रखकर प्रदान की जाती है |”

वर्तमान समय में वैयक्तिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया जा रहा है लेकिन वैयक्तिक शिक्षा उत्तम होने के बावजूद अधिक खर्चीली होने कारण हर जगह प्रदान नही की जा सकती है |

सामूहिक शिक्षा क्या होती है ? (What is Group Education ?)

सामूहिक शिक्षा (Group Education) वह शिक्षा होती है जो एक ही समय में शिक्षार्थियों के समूह को एक-साथ प्रदान की जाती है |

सामूहिक शिक्षा में सभी शिक्षार्थी एक ही ढंग से एक ही प्रकार की शिक्षा प्राप्त करते है, जिसमे उनकी वैयक्तिक-भिन्नताओं पर कोई ध्यान नही दिया जाता है |

सामूहिक शिक्षा (Group Education) में शिक्षक बालक की वैयक्तिक विभिन्नता को नजरअंदाज करता है और प्रत्येक बालक पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान नही दे पता है |

सामूहिक शिक्षा में शिक्षक तीव्र बुद्धि व मंद बुद्धि के बालको को नजरअंदाज करके सबको सामान्य बुद्धि का बालक मानकर शिक्षा देता है |

इस प्रकार “सामूहिक शिक्षा वह शिक्षा है जो एक ही समय में बहुत से छात्रों को एक साथ प्रदान की जाती है |”

वर्तमान समय में विद्यालयों में कक्षा-शिक्षण (Class Teaching) के रूप में सामूहिक शिक्षा ही प्रदान की जा रही है, जिसमे शिक्षार्थियों को एक सामान्य रूप से ज्ञान प्रदान किया जाता है |

इस प्रकार वैयक्तिक शिक्षा का सम्बन्ध मात्र एक बालक से होता है जबकि सामूहिक शिक्षा का सम्बन्ध बालकों के समूह से होता है |

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औपचारिक शिक्षा और अनौपचारिक शिक्षा – Formal Education and Informal Education

अब अंत में हम औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा के मध्य अंतर को समझते है |

औपचारिक शिक्षा क्या होती है ? (What is Formal Education ?)

औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा होती है जो पूर्व-निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार निश्चित शिक्षण-विधियों के द्वारा एक निश्चित संस्था में विचारपूर्वक पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रदान की जाती है |

औपचारिक शिक्षा कही भी, कभी भी, किसी भी समय दी जाने वाली शिक्षा नही, एक व्यवस्थित व विधिवत रूप से दी जाने वाली शिक्षा है |

औपचारिक शिक्षा को नियमित शिक्षा, सविधिक शिक्षा, योजनाबद्ध शिक्षा और सचेत शिक्षा भी कहा जाता है |

औपचारिक शिक्षा का मुख्य स्थान विद्यालय है | यह शिक्षा परीक्षा-केन्द्रित होती है और विद्यालयी पढ़ाई के साथ समाप्त हो जाती है |

हम कह सकते है कि “औपचारिक शिक्षा किसी शिक्षा संस्था (विद्यालय) द्वारा पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार नियंत्रित वातावरण में नियोजित व उद्देश्यपूर्ण तरीकें से प्रदान की जाती है |”

औपचारिक शिक्षा में शिक्षा के उद्देश्य, शिक्षा संस्था, शिक्षण-विधियाँ, पाठ्यचर्या, शिक्षण-अवधि, पाठ्यपुस्तकें, समय-सारणी आदि सभी पूर्व-निश्चित होते है | इस शिक्षा द्वारा शिक्षार्थी को निश्चित व निर्धारित समय में अपने पाठ्यक्रम का उचित ज्ञान व मार्गदर्शन मिलता है |

औपचारिक शिक्षा के साधन विद्यालय, चर्च, मदरसा, पुस्तकालय, म्यूजियम आदि है | औपचारिक शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति, समाज, राज्य आदि की आवश्यकता की पूर्ति करती है |

अनौपचारिक शिक्षा क्या होती है ? (What is Informal Education ?)

अनौपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है जिसे व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन में स्वतः, अनिश्चित और स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रतापूर्वक सीखता है, ज्ञान प्राप्त करता है |

अनौपचारिक शिक्षा में बालक अपनी स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार स्वतंत्रतापूर्वक बिना किसी बंधन के भिन्न-भिन्न अनुभवों के साथ सीखता है |

अनौपचारिक शिक्षा को अनियमित शिक्षा भी कहते है क्योकि इस शिक्षा में नियम, योजना आदि का अभाव होता है |

अनौपचारिक शिक्षा बिना किसी शिक्षक, शिक्षण-विधि, निश्चित उद्देश्य, पाठ्यचर्या, समय आदि के आजीवन स्वाभाविक रूप से चलती रहती है |

इस प्रकार हम कह सकते है कि “अनौपचारिक शिक्षा जीवनपर्यन्त स्वाभाविक रूप से चलने वाली एक प्रक्रिया है, जिसमे बालक बिना किसी बंधन के स्वतन्त्रतापूर्वक विभिन्न अनुभव प्राप्त करते हुए सीखता है |”

अनौपचारिक शिक्षा के प्रमुख साधन है – परिवार, समाज,धर्म, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीविजन, रेडियो आदि |

औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें – औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा में अंतर |

सार-संक्षेप – Shiksha Ke Prakar : शिक्षा के प्रकार

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शिक्षा में अंतर

प्रत्यक्ष शिक्षा में एक पूर्व-निश्चित योजना, पूर्व-निश्चित उद्देश्य व पूर्व-निश्चित शिक्षण विधियों के द्वारा शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच शिक्षा का आदान-प्रदान होता है |

अप्रत्यक्ष शिक्षा में बालक स्वतंत्र वातावरण में अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा स्वयं सीखता है | यहाँ बालक व शिक्षक के बीच प्रत्यक्ष स्थापित नही होता |

सकारात्मक और नकारात्मक शिक्षा में अंतर

सकारात्मक शिक्षा में बालक बिना किसी अनुभव व तर्क के पूर्व निश्चित आदर्शों व तथ्यों के द्वारा सीखता है |

नकारात्मक शिक्षा में बालक स्व-क्रिया व स्वानुभव के द्वारा अपनी वैयक्तिक भिन्नता के आधार पर सीखता है |

सामान्य और विशिष्ट शिक्षा में अंतर

सामान्य शिक्षा बालक की मात्र बौद्धिक विकास को विकसित करती है |

विशिष्ट शिक्षा बालक को किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दी जाती है |

एकांगी और सर्वांगीण शिक्षा में अंतर

एकांगी शिक्षा में बालक के व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष के विकास पर जोर दिया जाता है |

सर्वांगीण शिक्षा में बालक के व्यक्तित्व के सभी पक्षों के विकास पर जोर दिया जाता है |

वैयक्तिक और सामूहिक शिक्षा में अंतर

वैयक्तिक शिक्षा में बालक को उसकी वैयक्तिक-भिन्नता के आधार पर शिक्षा दी जाती है |

सामूहिक शिक्षा में एक ही समय में बालकों के एक समूह को शिक्षा दी जाती है |

औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा में अंतर

औपचारिक शिक्षा बालक को विधिवत् व व्यवस्थित रूप में दी जाने वाली शिक्षा है |

अनौपचारिक शिक्षा में बालक बिना किसी बंधन के स्वतंत्रतापूर्वक अपनी स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार सीखता है |

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