ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति : Society and Culture of Rig Vedic Period

ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति (Society and Culture of Rig Vedic Period): विद्यादूत के इस लेख में हम ऋग्वैदिक काल का सामाजिक जीवन कैसा था, पर चर्चा करेंगें साथ ही ऋग्वेद काल की संस्कृति पर भी प्रकाश डालेंगें | यह लेख UPSC, UPPSC और अन्य परीक्षाओं (UPSC Study Material in Hindi) के लिए अत्यंत उपयोगी है | ऋग्वेद कालीन समाज (ऋग्वैदिक समाज) की सबसे छोटी इकाई कुल (परिवार) होती थी | कुल में एक घर व एक छत के नीचे निवास करने वाले समस्त लोग शामिल थें | ऋग्वेद काल (ऋग्वैदिक काल) में कुल का प्रधान या मुखिया कुलप कहलाता था |

कुलप परिवार का सबसे बड़ा पुरुष होता था जो परिवार की रक्षा करता था | ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति (Rig Vedic Samaj Aur Sanskriti) में कई कुलों का समूह ग्राम कहलाता था | जिसका मुखिया ग्रामिणी कहलाता था |

ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति (Society and Culture of Rig Vedic Period) में ग्रामिणी, ग्राम (गाँव) के असैनिक और सैनिक दोनों कार्यो की जिम्मेदारी उठाता था | पाठकों को बता दे कि ग्राम से ही संग्राम शब्द बना है | ग्राम छोटे-छोटे कबायली समूह थे | कभी-कभी ये ग्राम आपस में टकरा जाते थे तब संग्राम अर्थात् युद्ध होता था |

ऋग्वेद के समाज (Rigvedic Samaj) में ग्रामों के समूह को विश् कहा जाता था, जिसका मुखिया विशपति कहा जाता था | ऋग्वेद (Rigved) में विश् शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है | विश् शब्द का तात्पर्य बस्ती होता है |

पाठकों को ये भी जानकारी होनी चाहिए कि वैश्य वर्ण का उदय इसी विश् नामक जनसमूह से हुआ था | विश् के समूह को जन कहा जाता था | जन कबीले को कहते थे |

ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ है | अपने जन या कबीले के प्रति ऋग्वैदिक आर्यों की सर्वाधिक आस्था होती थी | जन का मुखिया राजा होता था इसलिए उसे जनरक्षक और जनपति भी कहा जाता था |

ऋग्वेद कालीन समाज : पितृसत्तात्मक समाज : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

पितृसत्तात्मक परिवार क्या है ?

पितृसत्तात्मक परिवार के अनुसार परिवार का मुखिया पिता होता है और पिता का ही सम्पूर्ण परिवार, सम्पत्ति व भूमि पर पूर्ण अधिकार होता है | ऋग्वैदिक काल की सामाजिक दशा के अंतर्गत पितृसत्तात्मक समाज वैदिक सामाजिक जीवन का केंद्र-बिंदु था |

ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति में परिवार संयुक्त होते थें | एक परिवार कि अनेक पीढ़ियाँ एक ही घर में एक साथ रहती थीं |

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पिता का कठोर अनुशासन : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

ऋग्वेद कालीन पितृसत्तात्मक परिवार में पिता का अनुशासन अत्यंत कठोर होता था | पिता पुत्र को सम्पत्ति के अधिकार से वंचित भी कर सकता था |

यद्यपि वैदिक कालीन पिता व पारिवारिक सदस्यों के बीच मधुर सम्बन्ध होते थें, फिर भी पिता परिवार के सदस्यों को उनकी गलती पर कठोरतम दण्ड दे सकता था |

ऋग्वेद में ऋज्रास्व नामक पुत्र का वर्णन मिलता है, जिसके पिता ने उसे अंधा कर दिया था | इसीप्रकार शुन:शेप को उसके पिता द्वारा बेचे जाने का भी उल्लेख मिलता है |

पितृसत्तात्मक समाज में पुत्रों का महत्व : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

वैदिक कालीन समाज एवं संस्कृति (Vedic Kalin Samaj aur Sanskriti) के पितृसत्तात्मक समाज में पुत्रों की स्थिति अति-विशिष्ट होती थी | पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र होता था | पितृसत्तात्मक होने के कारण ऋग्वैदिक समाज में पुत्रों का अत्यधिक महत्व था | ऋग्वेद कालीन जनजीवन के वातावरण में युद्धों, संघर्षों, जन-संहारों और आक्रमणों का अत्यधिक प्रभाव था |

अतः संघर्ष व युद्ध का दौर होने के कारण कबीले में आर्य हमेशा वीर पुत्रों की प्राप्ति की कामना करते थें, क्योकि वही युद्ध में विजय दिला सकते थें | वैदिक आर्य ईश्वर से प्रार्थना करते थें कि उनके बहुत सारे पुत्र हों |

ऋग्वेद संहिता में पुत्र प्राप्ति के लिए ईश्वर से कामना कई बार व्यक्त गयी है, यहाँ तक की पशुओं की कामना सम्बन्धी सूक्त भी अनेकों बार मिलते हैं, लेकिन पुत्री हेतु कामना एक बार भी नही की गयी है |

ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

यद्यपि ऋग्वैदिक काल में समाज पितृसत्तात्मक था | लेकिन इसका यह मतलब नही है कि ऋग्वैदिक कालीन समाज में स्त्रियों का महत्व नही था | ऋग्वैदिक काल का इतिहास देखने पर पता चलता है कि ऋग्वेद समाज में स्त्रियों को पर्याप्त स्वतंत्रता व सम्मान प्राप्त था |

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ऋग्वेद संहिता में पत्नी को जायेदस्तम् (पत्नी ही गृह होती है) का दर्जा देकर सम्मानित किया गया है | स्त्रियाँ सभा और समिति में भाग लेती थीं | उत्तर वैदिक काल में सभा में स्त्रियों के शामिल होने पर रोक लगा दी गयी थी |

ऋग्वेद कालीन स्त्रियों को सम्मानित पद : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति

परिवार में पति-पत्नी की समान स्थिति होने के कारण स्त्रियाँ यज्ञों में पति के साथ आहुतियाँ देती थीं और सभी धार्मिक और सामाजिक उत्सवों/कर्मकाण्डों में वें पति की भागीदार बनती थीं (ऋग्वेद 5/28/1, 8/91/1, 10/86/1) | यद्यपि ऋग्वेद काल में पत्नी को सम्मानित पद प्राप्त था, तथापि वह अपने पति पर निश्चित रूप से आश्रित थी |

विवाह पूर्णतः अनिवार्य न था, घोषा की भांति अविवाहित स्त्रियाँ भी होती थीं, जो सुखपूर्वक अपने माता-पिता के साथ जीवन व्यतीत कर रही थीं |

ऋग्वेद काल में स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण कर सकती थीं और घोषा, अपाला, विश्ववारा व लोपामुद्रा जैसी कुछ ऐसी स्त्रियों के भी उदाहरण मिले है जिन्होंने सूक्तो की रचना की थीं |

स्त्रियाँ देर से विवाह कर सकती थीं और विवाह के लिए पति के चयन की स्वतंत्रता का भी उल्लेख कही-कही मिलता हैं |

ऋग्वेद (10/27/12) में उल्लेख है कि ‘जो स्त्री खुद ही अपने मित्र (पति) का चयन करती है, वही भद्रा वधू होती है |’ अगर कोई स्त्री अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान होती थी तब वह ही अपने पिता की सम्पत्ति की उत्तराधिकारी बनती थी |

घर में स्त्रियों को स्वामिनी के तौर पर पूर्णतया सम्मान प्राप्त था और दम्पति शब्द का प्रयोग घर के स्वामी और स्वामिनी के लिए संयुक्त रूप में प्रयुक्त होता था |

लेकिन इन सबके बावजूद ऋग्वेद कालीन समाज में अधिकतर इन्हे सदैव अपने पिताओं, भाइयों और पतियों पर निर्भर रहना पड़ता था |

आर्य पुत्री की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना नही करते थें | ऋग्वेद में कही भी पुत्री के लिए कामना व्यक्त नही की गयी हैं | इसके बावजूद भी ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति उत्तर वैदिक काल में महिलाओं की से बहुत बेहतर थी |

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा निम्न होती गयी और सामान्यतः स्त्रियों का स्थान पुरुषों के नीचे व अधीनस्थ माना जाने लगा |

ऋग्वेद संहिता में माता, पिता, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री को छोड़कर अन्य सभी जैसे चचेरे भाई-बहन, भतीजे, दादा, नाना, प्रपोत्र आदि के लिए संयुक्त रूप से नप्तृ शब्द का प्रयोग मिलता है |

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दादा, नाना, नाती, प्रपोत्र आदि सभी के लिए नप्तृ शब्द के प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि यें सभी एक साथ एक परिवार में ही रहते थें | ऐसा लगता है कि ऋग्वैदिक काल में एक परिवार की अनेक पीढ़ियाँ एक घर में एक साथ रहती थीं |

ऋग्वेद में देवियों का स्थान : Rigvedic Kalin Samaj Aur Sanskriti

Rigvedic Kalin Samaj Aur Sanskriti : ऋग्वेद में देवताओं (Rigved Ke Devta) की तुलना में देवियों को नगण्य माना गया है | ऐसा देखा गया है कि पशुचारण समाज में पुरुषों को स्त्रियों की तुलना में कही अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त होता है जबकि कृषि-प्रधान समाज में मातृत्व का स्थान सर्वोच्च होता है |

ऋग्वैदिक समाज भी पशुचारण पर आधारित होने के कारण पितृसत्तात्मक था | पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण ऋग्वेद में देवियों की तुलना में देवताओं (Rigved Ke Devta) को सर्वोच्च स्थान दिया गया |

ऋग्वैदिक काल के धार्मिक जीवन में इंद्राणि, उषा, अदिति, श्रद्धा, रोदसी, आदि देवियों को कोई विशेष महत्व नही दिया गया था | यहाँ तक कि ऋग्वेद के देवता इंद्र द्वारा उषा का बलात्कार अनेक स्थानों में किया गया है |

इसप्रकार ऋग्वेद कालीन देवता (Rigved Ke Devta) की तुलना में ऋग्वेद कालीन देवियों का महत्व अत्यधिक कम था | लेकिन इसका यह अर्थ नही है कि ऋग्वैदिक काल में देवियों (स्त्रियों) का आदर नही होता था |

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति – ऋग्वेद में वर्ग विभाजन

जब देवताओं ने मानव को बलि बनाकर यज्ञ किया,

जब उन्होंने मानव के अंगों को काटा, तो कितने भागों में बाँटा ?

क्या था उसका मुँह, क्या थी उसकी भुजाएं, क्या थी उसकी जंघाएँ, क्या कहलाये उसके पैर ?

ब्राह्मण था उसका मुँह, उसकी भुजाओं से बने क्षत्रिय, उसकी जंघाएँ वैश्य बनी, उसके पैरों से शूद्र का जन्म हुआ |

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति, वर्ण व्यवस्था का इतिहास : ऋग्वैदिक काल में व्यवसाय के आधार पर समाज का वर्गीकरण आरम्भ हुआ था | ऋग्वेद कालीन समाज कबायली समाज था | आरम्भ में ऋग्वेद कालीन कबायली समाज तीन वर्गों में विभाजित हुआ – योद्धा, पुरोहित और सामान्य लोग (प्रजा) |

वर्ण व्यवस्था के प्रकार – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र

कालान्तर में ऋग्वेद समाज चार वर्णों (वर्गों) में विभाजित हुआ – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | चौथा वर्ण (वर्ग), जिसे शूद्र कहा गया, ऋग्वैदिक काल के अंत में प्रकट होता है |

चौथे वर्ण शूद्र का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद (10/90/12) के दशवें मण्डल के पुरुष-सूक्त में हुआ है, जो सबसे बाद में जोड़ा गया था |

ऋग्वेद काल का यह सामाजिक वर्ग विभाजन (वर्ण-व्यवस्था) बहुत कठोर नही था | पुरोहितों व अध्यापकों को ब्राह्मण, शासकों व प्रशासकों को क्षत्रिय, वणिकों, साहूकारों व कृषकों को वैश्य और श्रमिकों, शिल्पियों व कारीगरों को शूद्र कहा गया | यें व्यवसाय अनिवार्य न होकर ऐच्छिक थें |

ऋग्वैदिक लोग यें व्यवसाय अपनी पसंद व योग्यता के अनुसार अपनाने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र थें | इस प्रकार ऋग्वेद काल की वर्ण-व्यवस्था ऐच्छिक थीं न कि आनुवांशिक |

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विभिन्न वर्णों के बीच वैवाहिक-सम्बन्धों पर किसी भी प्रकार की पाबंदी नही थी, न ही परस्पर खानपान सम्बन्धी किसी प्रकार की रोक थी | छुआछूत जैसी सामाजिक बुराईयों का जन्म अभी नही हुआ था |

ऋग्वैदिक काल में एक ही कुल (परिवार) के लोगों का अलग-अलग व्यवसाय अपनाने व अलग-अलग वर्ण के सदस्य बनने का वर्णन मिलता है | ऋग्वेद के एक सूक्त (9/112) में एक परिवार का सदस्य कहता है कि –

“मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं, मेरी माँ चक्की चलाने वाली हैं, भिन्न-भिन्न व्यवसायों से जीविकोपार्जन करते हुए हम एक साथ रहते हैं, जैसे पशु (अपने बाड़े में) रहते हैं |”

स्पष्ट है कि ऋग्वेद काल में एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग व्यवसाय में संलग्न थें और अपनी इच्छानुसार अपना व्यवसाय बदलने के लिए पूर्णरूप से स्वतंत्र थें |

इस काल में वंश परम्परा के अनुसार व्यवसाय अपनाना अनिवार्य नही था जैसाकि कालान्तर में देखा जा सकता है | 

बाल विवाह और विधवा विवाह

वैदिक संस्कृति में विवाह को एक धार्मिक कृत्य माना जाता था | एकपत्नीत्व विवाह का नियम था परन्तु बहुपत्नीत्व पर भी रोक नही थी |

ऋग्वेद (10/101/11) में दो पत्नियों वाले पुरुष को ऐसा घोड़ा कहा गया है, जो रथ की दोनों धुराओं में मध्य दबा हुआ चलता है |

पूर्व वैदिक कालीन सभ्यता (ऋग्वैदिक समाज) में बाल-विवाह का प्रचलन नही था | विद्वानों के अनुसार इस काल में विवाह सोलह या सत्रह साल की आयु में किया जाता था |

ऋग्वैदिक काल में विधवा-विवाह भी प्रचलित था | विधवा का पुनर्विवाह सामान्यतः मृत पति के भाई के साथ हुआ करता था |

लेखक का मानना है कि विधवा विवाह उस काल की आवश्यकता थी, क्योकि उस काल में पुरुष लगातार होने वाले कबीलाई युद्धों में मारे जा रहे थे, और बड़ी संख्या में स्त्रियाँ विधवा हो रही थीं | इसलिए ऐसी स्त्रियों को सहारा देने के लिए विधवा विवाह आवश्यक था | साथ ही आर्य कबीलों को ज्यादा योद्धा पुत्र पाने के लिए ज्यादा स्त्रियों की आवश्यकता थी | ऋग्वेद (10/85/45) में एक स्थान पर प्रार्थना की गयी है कि पत्नी दस पुत्रों को जन्म दे |

ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति में नियोग प्रथा

पूर्व वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में हमे सती प्रथा का स्पष्ट उल्लेख कही भी नही मिलता है | पति की मृत्यु के बाद अगर विधवा स्त्री निसंतान है तो वह स्त्री नियोग द्वारा सन्तान प्राप्त कर सकती थी |

नियोग प्रथा का अर्थ

नियोग प्रथा के अनुसार जब किसी निसंतान स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी या उसका पति सन्तान उत्पन्न करने के योग्य नही होता है तो वह स्त्री अपने देवर या किसी निकट के सम्बन्धी के साथ सहवास करके कुछ सन्तान पैदा करती है |

धर्मशास्त्रों ने नियोग को अनुमति प्रदान की है | ऋग्वेद (10/40/2) में उल्लेख है कि पुत्रहीन विधवा अपने मृत पति के भाई (देवर) से सन्तान की उत्पत्ति कर सकती है |

ऋग्वैदिक कालीन विवाह संस्था

वैदिक काल में विवाह एक धार्मिक कृत्य था | वैदिक धर्म के अंतर्गत यज्ञ जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पत्नी का होना अत्यधिक आवश्यक होता था | पति-पत्नी के सम्बन्ध को शाश्वत माना जाता था |

इसीलिए पत्नी को वैदिक काल में अर्धांगिनी व सहधर्मिणी का दर्जा दिया गया था | ऋग्वेद (10/85/46) में कहा गया है कि स्त्री अपने श्वसुर, सास, ननद इत्यादि परिवार के लोगों पर साम्राज्ञी की भांति शासन करे |

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ऋग्वेद में विवाह के अनेक उद्देश्यों का उल्लेख है | इनमें से एक उद्देश्य वीर पुत्र की प्राप्ति करना और पुत्र द्वारा अमरत्व को प्राप्त करना था |

वैदिक आर्य मानते थें कि सन्तान-तन्तु को न टूटने देने से वें अमरत्व को प्राप्त कर लेंगें (ऋग्वेद 5/4/10) | विवाह का एक अन्य उद्देश्य धर्म का पालन करना भी था |

विवाह की आदिम प्रथाएँ

ऋग्वैदिक काल की सामाजिक स्थिति के अंतर्गत हमे देखने को मिलता है कि विवाह संस्था पूर्ण रूप से स्थापित हो चुकी थी, लेकिन कही-कही आदिम प्रथाओं के उदाहरण भी मिलते है |

प्रोफेसर आर.एस. शर्मा लिखते है कि “यह विख्यात मिथक है कि प्रजापति अपनी ही पुत्री पर आसक्त हो गये थें | यह भी देखने को मिलता है कि पूषन् ने अपनी माता से प्रेम याचना की थी | ………. मानव-जाति के पिता मनु का प्रसिद्ध उदाहरण भी हमे मिलता है कि मनु जन्म ब्रह्मा और उनकी पुत्री शतरूपा के संयोग से हुआ था |”

ऐसा ही एक उदाहरण भाई-बहन यम और यमी की कहानी में मिलता है जब यम (मृत्यु का देवता) से उसकी जुड़वाँ बहन यमी ने विवाह का निवेदन किया तो यम ने उसे अस्वीकार कर दिया (ऋग्वेद 10/10/10)

सम्भव है ये सभी उदाहरण प्रारम्भिक समाज के उस चरण के हो जब विवाह-संस्था कायम नही हो पाई थी | लेकिन प्रोफेसर आर.एस. शर्मा आगे लिखते है कि “विवाह प्रथा कायम होने के पश्चात् भी स्वच्छंद मैथुन कि प्राचीन प्रथा को याद दिलाने वाले कुछ रिवाज स्मृति काल तक चलते रहे, जिसके परिणामस्वरूप स्मृतिकारों को स्वीकृत वैवाहिक सम्बन्धों से बाहर मैथुन से उत्पन्न पुत्रों के लिए कुछ प्रावधान करने पड़े | मनु का कहना है कि पति के अतिरिक्त पराये पुरुष के साथ मैथुन के परिणामस्वरूप यदि किन्ही स्त्रियों के बच्चे जन्म लेते हैं तथा उनके पिता की पहचान सम्भव नही है तो उन्हें गूढ़ोत्पन्न कहा जाता है |”

ऋग्वैदिक कालीन समाज में बहुपति-विवाह के भी कुछ एक उदाहरण मिलते है जैसे सूर्य की पुत्री सूर्या का विवाह दो भाई अश्विन् के साथ हुआ था | रोदसी मरुतों के साथ रहती थी |

वधू का मूल्य व दहेज दोनों ही प्रथाएँ प्रचलित थीं | लेकिन इस सब के आलावा ऋग्वेद में कही पर भी न तो पर्दा-प्रथा का प्रमाण मिलता है और न ही सती प्रथा का |

ऋग्वेद कालीन समाज और संस्कृति में वेशभूषा

ऋग्वैदिक काल की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन पर पता चलता है कि वैदिक आर्य वेशभूषा पर पर्याप्त ध्यान देते थें | आर्यों के वस्त्र सूत, ऊन, रेशम और मृगचर्म (अजिन) से बनाएं जाते थे |

पाण्ड्व एक ऊनी कपड़े को कहा जाता था | आर्यों के वस्त्र के तीन भागों का उल्लेख मिलता है | नीवी, वास और अधिवास |

नीवी – सम्भवतः नीवी भीतरी वस्त्र होता था,

वास – ऊपर की पोशाक वास कहलाती थी और

अधिवास – अधिवास ऊपर से धारण किये जाने वाली ओढ़नी थी |

वैदिक पोशाकें अनेक रंगों की होती थीं | तार्प्य एक रेशमी वस्त्र होता था, जिसे अधिवास के रूप में प्रयोग किया जाता था | स्त्री और पुरुष दोनों के ही पगड़ी (उष्णीष) पहनने का उल्लेख मिलता है | ऋग्वेद में नाई (नापित) और उस्तरे (क्षुर) का भी उल्लेख मिलता है | आर्य पैरों में जूते भी पहनते थें |

ऋग्वेद कालीन समाज व संस्कृति में आभूषण

वैदिक कालीन स्त्री-पुरुष कई प्रकार के आभूषण भी पहनते थें | ऋग्वेद में निष्क, कर्णशोभन, कुरीर, रुक्म व मणि आभूषणों का वर्णन है | निष्क गले में पहनने वाला एक प्रकार का हार होता था | ऋग्वेद (5/19/3) में निष्कग्रीव का वर्णन है |

कर्णशोभन कानों में पहना जाता था | कुरीर को सिर अथवा माथे पर धारण किया जाता था | रुक्म आभूषण छाती पर लटका रहता था | मणि (मणिग्रीव) आभूषण गर्दन में लटका कर पहना जाता था |

केशविन्यास पर भी अधिक ध्यान दिया जाता था | ऋग्वेद (10/144/3) में एक ऐसी स्त्री का उल्लेख है जो अपने बालों की चार वेणियाँ बनाए हुए थी |

पूर्व वैदिक कालीन समाज एवं संस्कृति में भोजन

वैदिककालीन लोग (आर्य) शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन पसंद करते थे | वे मछली, पक्षी, भेड़, बकरी, हिरन, सूअर आदि सब खाते थे | यज्ञ में बलिदान करके पशुओं का मांस देवताओं को अर्पित किया जाता था तथा प्रसाद के रूप में खाया जाता था |

पूर्व वैदिक काल (ऋग्वेद काल) में धार्मिक समाराहों में और प्रिय अतिथियों के आगमन पर गाय, बैल, भेड़ और बकरे का मांस परोसा जाता था |

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शाकाहारी भोजन में खीर (क्षीर-पाकमोदनम्), दूध, दही, मक्खन, घी, विभिन्न फल व सब्जियां उपयोग की जाती थी | गेहूँ और जौ की रोटी (अपूप) खायी जाती थी | भोजन को मीठा बनाने हेतु मधु (शहद) का उपयोग किया जाता था | ऋग्वेद खाने में नमक के उपयोग की जानकारी कही नही देता है |

पूर्व वैदिक काल के समाज में सोम और सुरा

वैदिक आर्य सुरा और सोम जैसे मद्यपेय पीकर नशा भी करते थें | सोम एक विशिष्ट पौधे से निकाला गया रस था, जो हिमालय के मूजवन्त शिखर पर प्राप्त किया जाता था | बड़े प्रयास के बाद भी इस पौधे की पहचान में अभी तक असफलता ही मिली है |

सोम आर्यों के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि इसे देवता का स्थान दिया गया था साथ ही ऋग्वेद के नवे मंडल के सभी सूक्त सोम को समर्पित किये गये है |

ऐसा समझा जाता है कि आर्य सोम का उपयोग अधिकतर धार्मिक उत्सवों जैसे विशेष दिनों पर करते थे और इसके उपभोग को धार्मिक मान्यता प्राप्त थी |

जबकि सुरा पूर्णतया धर्म-निरपेक्ष थी, इसका उपयोग आम दिनों में किया जाता था | ऋग्वेद में सुरा के मद्यपान की आलोचना की गयी है तथा बताया गया है कि इसे पीकर लोग सभा में लड़ने-झगड़ने लगते थे |

ऋग्वैदिक समाज में पशुपालन : ऋग्वैदिक काल की आर्थिक दशा

ऋग्वैदिक समाज पशुचारण (पशुपालन) पर आधारित था | युद्धप्रेमी आर्य अर्ध-विचरणशील पशुचारिओं के रूप में भारत आयें थें | इस समय आर्य खानाबदोश या अर्ध-खानाबदोश की स्थिति में अपने पशुओं के साथ जीवन-यापन कर रहे थें |

उनका निर्वाह मुख्यता पशु-उत्पादनों से होता था | आर्य विविध पालतू पशुओं को पालते थें | पालतू पशुओं में गाय, बैल, घोड़े, भेड़, बकरी, कुत्ते आदि थें, जिनमें गाय और बैल प्रधान थें |

पशुचारण सामूहिक रूप से किया जाता था | ऋग्वैदिक आर्य एक स्थान से दूसरे स्थान जाते थें तथा अपने प्रवासी प्रक्रिया में वें अपनी पशु-संपदा को भी लेकर चलते थें |

ऋग्वेद कालीन कृषि व्यवसाय : ऋग्वैदिक काल की आर्थिक दशा

पशुचारण (पशुपालन) की तुलना में कृषि का व्यवसाय नगण्य-सा था | सम्भवतः यही कारण है कि ऋग्वेद में मात्र 24 श्लोकों में ही कृषि का उल्लेख मिलता है | हालाँकि ऋग्वैदिक आर्यों को कृषि की अच्छी जानकारी का पता चलता है |

ऋग्वेद में हमें एक ही अनाज यव का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ बाद में जौ लगाया गया | ऋग्वेद के प्राचीनतम भाग में हमे फाल का उल्लेख भी मिलता है, जो सम्भवतः लकड़ी का बना होगा |

ऋग्वैदिक आर्यों को विभिन्न ऋतुओं, बोवाई, कटाई व दावनी की भी जानकारी थी | हमे सिंचाई का उल्लेख ऋग्वैदिक काल की जगह उत्तर-वैदिक काल में ही मिलता है |

ऋग्वेद कालीन भूमि का स्वामित्व : ऋग्वेद काल की आर्थिक दशा

साहित्यिक और पुरातात्विक साक्ष्य यह स्पष्ट करते है कि ऋग्वैदिक आर्य कृषि पर आधारित स्थायी जीवन-यापन नही कर रहे थे | इसलिए भूस्वामित्व के आधार पर भूमि व्यक्तिगत सम्पत्ति नही होती थी बल्कि भूमि का अधिग्रहण व्यावसायिक आधार पर होता था |

ऋग्वैदिक कालीन भूस्वामित्व किसी निजी व्यक्ति अथवा परिवार के हाथों में नही थी बल्कि सम्पूर्ण कबीले के हाथ में होती थी | अतः ऋग्वैदिक काल में भूमि निजी सम्पत्ति नही होती थी बल्कि ऋग्वैदिक आर्य पशु (गाय) चराने, निवास और खेती करने के लिए भूमि पर कब्जा करते थें |

संभवतः इसीलिए ऋग्वेद में पुरोहितों को दी जाने वाली दक्षिणा में आम-तौर पर गायों और दसियों का उल्लेख मिलता है, न कि भूमि का |

वैदिक जीवन में घोड़ों का महत्व

आर्यों के जीवन में घोड़ों का भी अत्यधिक महत्व था | घोड़ों की वजह से ही आर्य युद्ध में विजय प्राप्त करते थें और घोड़े ही उस समय आवागमन के तेज माध्यम थें |

घोडें पर सवार होकर आर्य विस्तृत चरागाहों में अपने मवेशियों पर आसानी से नजर रखतें थें और उनकें अपहरण को रोकते थें | ऋग्वेद में दधिक्रा नामक एक अश्व दैवी का वर्णन मिलता है |

बकरियाँ व भेड़ें भी पाली जाते थें | मवेशियों के लिए चरागाह होते थें | वैदिक काल में चरागाह के अधिकारी को व्राजपति कहते थें | 

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ऋग्वैदिक काल में गाय का महत्व

ऋग्वेद कालीन संस्कृति में गाय अत्यधिक मूल्यवान वस्तु समझी जाती थी | उस समय व्यापार का अर्थ होता था वस्तु-विनिमय | गाय विनिमय का माध्यम होती थीं | ऋग्वेद काल और उत्तर वैदिक काल में गाय सबसे उत्तम धन थीं | ऋग्वेद कालीन समाज में बड़े सौदों में मूल्य की इकाई गाय मानी जाती थी |

ऋग्वेद के एक सूक्त (4/24/10) में एक इन्द्र की प्रतिमा की कीमत दस गाय बताई गयी है | ऋग्वेद में एक स्थान पर तो देवताओं को भी गायों से उत्पन्न हुआ बताया गया है |

ऋग्वेद ग्रंथ में कई जगह देवताओं से गाय (पशु-सम्पदा) पाने के लिए स्तुतियां मिलती है | रयि (सम्पत्ति) की गणना मुख्य रूप से पशुओं (गायों) से ही होती है | गाय के लिए ही आर्यों के बीच अक्सर लड़ाईयां होती थी |

यहाँ तक कि गविष्टि (गाय की खोज) ही युद्ध का पर्याय माना जाता था | पुत्री को दुहितृ कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ गाय दुहने वाली है |

ऋग्वेद काल और उत्तर वैदिक काल में गायों का अपहरण

ऋग्वेद (वैदिक) काल में गाय सबसे उत्तम धन होती थीं, इसलिए इनकी चोरी व अपहरण आम बात थी | आर्य पणियों से डरते थें क्योकि वें आर्यों की मुख्य सम्पत्ति पशुओं (गायों) को चुरा ले जाते थें |

पणि अनार्य जातियों में से एक थें और आर्यों के अनुसार पणि विचित्र देवताओं की उपासना करते थें | आर्य उन्हें अपना शत्रु मानते थें क्योकि पणियों ने वैदिक कालीन आचार्यों को आश्रय देने से मना कर दिया था |

आर्य पणियों से इसलिए ईर्ष्या करते थें क्योकि वें पशु सम्पत्ति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध थें | गायों की चोरी रोकने के लिए गुप्तचर (स्पश) भी रखे जाते थें |

क्या आर्य गोमांस खाते थें ?

वैदिक काल में मांसाहारी भोजन के अंतर्गत आर्य गाय का मांस खाते थे कि नही ? इस प्रश्न पर बड़ा विवाद है | लेकिन ऋग्वेद के गहन अध्ययन के बाद यह बात स्वीकार करने में कोई आपत्ति नही लगती है कि ऋग्वैदिक आर्य गाय और बैल दोनों का मांस खाते थे |

वैदिक आर्य अतिथि के लिए गोहन अर्थात गोहन्ता शब्द का इस्तेमाल करते थें | जिससे पता चलता है की अतिथियों के लिए गाय को मारा जाता था और उन्हें गोमांस परोसा जाता था |

चूँकि गाय एक बहुमूल्य वस्तु थी इसलिए गोमांस कुछ विशेष अवसरों पर ही खाया जाता था, जैसे – यज्ञ, कर्मकाण्ड, किसी विशिष्ट अतिथि या प्रतिष्ठित व्यक्ति के आतिथ्य के लिए | विद्यादूत के अन्य लेख में पृथक रूप से ऋग्वेद और गाय, ऋग्वेद में गाय काटने का वर्णन, वेदों में गाय बलिदान, हिन्दू धर्म ग्रंथ और गोमांस, शास्त्रों में गोमांस भक्षण आदि पर चर्चा की जाएगी |

लेकिन वैदिक काल में गाय के लिए कई स्थानों पर अधन्या (न मारने योग्य) शब्द के प्रयोग किये जाने से पता चलता है कि कालान्तर में गाय के मारने का धीरे-धीरे परित्याग किया जाने लगा | सम्भवता इसलिए नही कि इसका कोई धार्मिक महत्व बन गया बल्कि इसलिए कि इससे पशुधन का ह्रास होता था |

रोमिला थापर लिखती हैं कि “गाय के आर्थिक महत्व ने उसकी पूजनीयता को और अधिक बढ़ा दिया | सम्भव है कि बाद के काल में जो गाय को अवध्या व पवित्र माना जाने लगा उसमें इस बात का योगदान रहा हो |” वें यह भी लिखती हैं कि “गोमांस भक्षण का त्याग प्रतिष्ठा का विषय बन गया तथा विभिन्न धार्मिक आदेशों ने इस निषेध को सबल बनाया |”

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ए.एल. बाशम लिखते है कि “वास्तव में आर्यों के लिए पशु एक प्रकार के सिक्के थें तथा पशुओं के द्वारा ही वस्तुओं का मूल्याकंन किया जाता था | हमारे पास इसका कोई प्रमाण नही कि वैदिक काल में पशु पवित्र माने जाते थें | मात्र एक या दो स्थानों पर गाय को अवध्य कहा गया है, लेकिन इसमे केवल गाय की आर्थिक महत्ता ही अंतर्निहित हो सकती है | किसी भी दशा में यह पूर्णरूप से स्पष्ट है कि गायों और बैलों दोनों का ही भोजन हेतु वध किया जाता था |”

पूर्व वैदिक काल में ग्रामीण जीवन

ऋग्वेद कालीन संस्कृति में आर्य हड़प्पावासियों की भांति नगरों में पक्के मकानों में नही रहते थें | वैदिक आर्य ग्रामीण जीवन जी रहे थे | ऋग्वेद में आर्यों के नगरीय जीवन जीने का उल्लेख कही नही मिलता है |

यह महत्वपूर्ण बात है कि ऋग्वेद ने इन्द्र को पुरों (नगरों) के विध्वंसक (पुरन्दर) के रूप में प्रस्तुत किया है न कि नगरों के निर्माणकर्ता के रूप में |

ऋग्वेद कालीन घर

ऋग्वैदिक कालीन आर्य गावों में किसी न किसी प्रकार का गढ़ (पुर) बनाकर मिट्टी और लकड़ी के घरों में रहते थे | लकड़ी के एक ढांचे को आधार बनाकर घरों का निर्माण किया जाता था तथा भूसे की दीवार खड़ी करके कमरे निर्मित किये जाते थें | छत बांस की खपच्चियों से छप्पर को सहारा देकर निर्मित की जाती थी |

वैदिक काल में आर्यों के घर बड़े होते थे जिनमे उनका परिवार और पालतू पशु साथ-साथ एक ही छत के नीचे रहते थे | पारिवारिक अग्निकुण्ड को विशिष्ट प्रतिष्ठा दी जाती थीं तथा उस अग्निकुण्ड में अग्नि सदैव प्रज्वलित रखी जाती थी |

ऋग्वैदिक कालीन आमोद-प्रमोद

वैदिक संस्कृति (वैदिक सभ्यता) में आर्य आमोद-प्रमोद का भौतिक जीवन व्यतीत कर रहे थे | नृत्य, गायन, वीणा-वादन, आखेट, रथ-दौड़ आदि आमोद-प्रमोद ऋग्वैदिक कालीन सभ्यता के मुख्य साधन थे |

ऋग्वेद काल के समाज में आर्य ढोल, मंजीरे, बाँसुरी, बीन, वीणा आदि बजाते थे | आर्यों की संगीत में विशेष रूचि थी |

स्त्री व पुरुष दोनों ही नृत्य करते थें | वैदिक काल (ऋग्वेद काल और उत्तर वैदिक काल) पुरुष नर्तक को नृत और स्त्री नर्तक को नृतू कहा जाता था | आखेट के अंतर्गत शेर, हाथी, जंगली सूअर, हिरन, विभिन्न पक्षीयों आदि का शिकार किया जाता था |

पूर्व वैदिक काल में जुआ खेलना लोकप्रिय था | आर्य अपने अवकाश के समय का उपयोग मुख्यतः नृत्य, गायन, संगीत व जुए में करते थें | अधिक रोमांच के लिए रथों की दौड़ का आयोजन भी किया जाता था |

पूर्व वैदिक काल (ऋग्वैदिक काल) में यातायात के साधन

यातायात के मुख्य साधन अश्वचालित रथ और बैल-गाड़ी थें | रथों का प्रयोग युद्ध में भी होता था | ऐसा माना जाता है कि पश्चिम एशिया और भारत में रथों का प्रचलन सर्वप्रथम आर्यों ने ही किया था | इन अश्वचालित रथों को आर्यों की विजय का मुख्य कारण माना जाता है |

लोगों और व्यापारियों के लिए स्थल मार्ग सुगम बनाने के लिए जंगलों को जला कर साफ किया जाता था | इसीकारण अग्नि देवता को पथिकृत (पथ का निर्माता) भी कहा जाता था |

ऋग्वेद काल की नदियां : ऋग्वेद काल के दरिया

ऋग्वेद के नदी सूक्त में हमे 21 नदियों के नाम मिलते है | जिनमे गंगा, कुभा (काबुल), क्रुमु (कुर्रम), यमुना, सतलज, सरस्वती, रावी, झेलम, सिन्धु प्रमुख हैं |

जहाँ तक समुद्र-मार्ग का प्रश्न है, इस बात पर अत्यधिक विवाद है कि आर्य समुद्र या महासागर से अवगत थे कि नही | विद्वानों का मानना है कि ऋग्वेद में उल्लेखित समुद्र शब्द मुख्यतया जलराशि का वाचक है |

कुछ विद्वानों का मानना है कि इस काल में समुद्र का अर्थ सिन्धु नदी की निचली धारा से था |

ऋग्वैदिक काल के प्रश्न उत्तर : ऋग्वेद काल का समाज और संस्कृति

  • प्रश्न : शुनःशेप की कहानी ऋग्वेद के किस सूक्त में मिलती है ?
  • उत्तर : शुनःशेप की कहानी ऋग्वेद के ‘वरुण सूक्त’ में मिलती है |
  • प्रश्न : ऋग्वैदिक समाज में परिवार कैसा था ?
  • उत्तर : ऋग्वैदिक समाज का आधार परिवार था, जो पितृ-सत्तात्मक था |
  • प्रश्न : ऋग्वैदिक समाज के प्रारम्भ में किन तीन वर्णों का उल्लेख मिलता है ?
  • उत्तर : ऋग्वैदिक काल के प्रारम्भ में तीन वर्णों का उल्लेख मिलता है – 1. ब्रह्म, 2. क्षत्र और 3. विशः
  • प्रश्न : शुद्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख कहा मिलता है ?
  • उत्तर : ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषसूक्त में सर्वप्रथम ‘शुद्र’ शब्द का उल्लेख मिलता है | यह वर्णव्यवस्था का प्राचीनतम उल्लेख है |
  • प्रश्न : किस ब्राह्मण ग्रंथ में पत्नी को पति की ‘अर्धांगिनी’ कहा गया है ?
  • उत्तर : शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है |
  • प्रश्न : ऋग्वेद में किस पशु के लिए ‘अधन्या’ (न मारने योग्य) और ‘अष्टकर्णी’ (कानों पर 8 के चिन्ह से अंकित) शब्दों का प्रयोग किया गया है ?
  • उत्तर : ऋग्वेद में गाय के लिए ‘अधन्या’ (न मारने योग्य) और ‘अष्टकर्णी’ शब्द का प्रयोग मिलता है |
  • प्रश्न : ऋग्वैदिक काल में व्यापार-वाणिज्य प्रमुखतः किस वर्ग के हाथ में था ?
  • उत्तर : पूर्व वैदिक काल में व्यापार-वाणिज्य प्रधानतः ‘पणि’ वर्ग के लोग करते थें |

निष्कर्ष : ऋग्वेद कालीन समाज एवं संस्कृति (Society and Culture of Rig Vedic Period)

ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई कुल होती थी | कुलों का समूह ग्राम, ग्रामों का समूह विश्, विश् का समूह जन कहलाता था | जन का प्रधान राजा (जनरक्षक, जनपति) होता था |

वैदिक सामाजिक जीवन का केंद्र-बिंदु पितृसत्तात्मक समाज था | संयुक्त परिवार में अनेक पीढ़ियाँ एक ही घर में साथ-साथ निवास करती थी |

पिता व पारिवारिक सदस्यों के बीच सम्बन्ध मधुर होते थे फिर भी पिता अनुशासन प्रेमी होता था | पुत्रों का महत्व पुत्रियों से कही अधिक होता था और सम्पत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र होता था |

पत्नी को सम्मान प्राप्त था, लेकिन वें पति पर आश्रित होती थी | आजीवन अविवाहित स्त्रियाँ भी अपने माता-पिता के साथ सुखी जीवन जीती थी | देवताओं की तुलना में देवियों का महत्व अत्यंत निम्न था |

समाज में चार वर्णों की उत्पत्ति हो चुकी थी लेकिन वर्णव्यवस्था अनिवार्य न होकर ऐच्छिक थी | छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई बिलकुल भी मौजूद नही थी |

सामान्यतः विवाह एकपत्नीत्व थें परन्तु बहुपत्नीत्व विवाह भी होते थें | आदिम विवाह भी देखने को मिलते थें | बाल-विवाह नही होते थें, जबकि विधवा-विवाह और नियोग प्रथा का प्रचलन था |

वस्त्र सूत, ऊन, रेशम और मृगचर्म से निर्मित किये जाते थें | वस्त्र के तीन भाग होते थें – नीवी, वास व अधिवास | निष्क, कर्णशोभन, कुरीर, रुक्म व मणि आदि आभूषण पहने जाते थें |

भोजन शाकाहारी व मांसाहारी दोनों ही खायें जाते थें | गोमांस भी खायें जाने का उल्लेख है | सुरा व सोम पीकर नशा भी किया जाता था |

मुख्य व्यवसाय पशुचारण/पशुपालन था | पशुचारण सामूहिक होता था | कृषि की भी अच्छी जानकारी थी | भूस्वामित्व सम्पूर्ण कबीले के हाथ में होती थी | गाय उत्तम धन और विनिमय का माध्यम थीं | घोड़े महत्वपूर्ण थें और आवागमन के तेज माध्यम थें |

आर्यों नगरीय जीवन की जगह ग्रामीण जीवन जी रहे थे | घर मिट्टी व लकड़ी के होते थें | भौतिक जीवन आमोद-प्रमोद का था | अश्वचालित रथ व बैल-गाड़ी यातायात के प्रमुख साधन थें |

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